सल्तनत ए🗡️ उस्मानिया-भाग-२ ✍🏻मोहम्मद शोएब
सल्तनत ए🗡️ उस्मानिया
पोस्ट 2
ये पोस्ट सल्तनतें उस्मानिया पे नही हे ,सल्तनत ए अब्बासिया हलाकू खान पे हे ये उसी दौर की बात हे, इसी हलाकू खान की तबाही की वजह से गाज़ी अल तुगरल ने मुसलमान को मजबूत किया और फिर सल्तनत ए उस्मानिया की सुरुआत हुई ।
पार्ट 2
पहले की पोस्ट में हलाकू खान की दरिंदगी को मैने बताया था कि कैसे उसने मुसलमानो को क़त्ल किया
मोर्रिकहीन लिखते हे कि इस हलाकू खान ने सिर्फ मुसलमान को क़त्ल ही नही किया बल्कि मसाजिद को भी सहीद करवाया उस वक़्त दुनिया की सबसे बड़ी लाइब्रेली , बिग वर्ल्ड लाइब्रेली, में जितनी भी कुतुबे हदीश थी जितनी भी किताबे क़ुरआन की तफ़्सीर वगेरा सब इसने दजला नदी में डलवा दी थी जिसकी सिहाई से दजला का पानी काला हो गया था कई दिनों तक ऐसा ही रहा
दजला का पानी लाल भी हुवा ओर उसकी वजह मुसलमानो का खून था जिसने 11 लाख से ज्यादा आबादी वाले सहर में ऐसा क़त्ल गारत का नंगा नाच किया कि सिर्फ लासे ही नज़र आती थी
हलाकू खान ने 29 जनवरी 1257 को बगदाद की घेरा बन्दी की थी
इससे पहले उसने खत लिखा था
हलाक़ू का खत
हमले से पहले हलाक़ू ने ख़लीफ़ा को लिखा था, "लोहे के सूए को मुक्का मारने की कोशिश न करो. सूरज को बुझी हुई मोमबत्ती समझने की ग़लती न करो. बग़दाद की दीवारें फ़ौरन गिरा दो. उसकी खाइयां पाट दो, हुकूमत छोड़ दो और हमारे पास आ जाओ. अगर हमने बग़दाद पर चढ़ाई की तो तुम्हें न गहरे पाताल में पनाह मिलेगी और न ऊंचे आसमान में."
37वें अब्बासी ख़लीफ़ा मुसतआसिम बिल्लाह की वो शानो शौकत तो नहीं थी जो उनके पूर्वजों के हिस्से मेंआई थी.
लेकिन फिर भी मुस्लिम दुनिया के अधिकतर हिस्से पर उनका सिक्का चलता था और ख़लीफ़ा की यह ताक़त थी कि उन पर हमले की ख़बर सुनकर मराकश से लेकर ईरान तक के सभी मुसलमान उनके समर्थन में खड़े हो जाते थे.
इसलिए ख़लीफ़ा ने हलाकू को जवाब में लिखा, "नौजवान, दस दिन की ख़ुशकिस्मती से तुम ख़ुद को ब्रह्मांड का मालिक समझने लगे हो. मेरे पास पूरब से पश्चिम तक ख़ुदा को मानने वाली जनता है. सलामती से लौट जाओ."
हलाकू ख़ान को अपने मंगोल सिपाहियों की क्षमता पर पूरा भरोसा था.
वो पिछले चार सालों के दौरान अपने देश मंगोलिया से निकलकर चार हज़ार मील दूर तक आ पहुंचे थे और इस दौरान दुनिया के बड़े हिस्से को अपना बना चुके थे.
बग़दाद पर हमले की तैयारियों के दौरान न सिर्फ़ हलाकू ख़ान के भाई मंगू ख़ान ने नए सैनिक दस्ते भिजवाए थे बल्कि अरमेनिया और जॉर्जिया से ख़ासी संख्या में इसाई फ़ौजें भी उनके साथ आ मिली थीं जो मुसलमानों से सलीबी जंगों में पूरब की हार का बदला लेने के लिए बेताब थीं.
यही नहीं मंगोल फ़ौज तकनीकी लिहाज़ से भी कहीं ज़्यादा बड़ी और आधुनिक थी. मंगोल फ़ौज में चीनी इंजीनियरों की इकाई थी जो बारूद के इस्तेमाल में महारत रखती थी.
बग़दाद के लोग उन तीरों के बारे में जानते थे जिन पर आग लगाकर फेंका जाता था लेकिन बारूद से उनका कभी वास्ता नहीं पड़ा था.
मंगोल धर्म में किसी बादशाह का ज़मीन पर ख़ून बहाना अपशकुन समझा जाता था.
इसलिए हलाकू शुरू में ख़लीफ़ा को यह विश्वास दिलाता रहा कि वह बग़दाद में उसका मेहमान बनकर आया है.
ख़लीफ़ा की मौत के बारे में कई कहानियां मशहूर हैं. हालांकि, अधिक भरोसेमंद हलाकू के मंत्री नसीरूद्दीन तोसी का बयान है जो उस मौके पर मौजूद थे.
वो लिखते हैं कि ख़लीफ़ा को चंद दिन भूखा रखने के बाद उनके सामने एक ढका हुआ बर्तन लाया गया.
भूखे ख़लीफ़ा ने बेताबी से ढक्कन उठाया तो देखा कि बर्तन हीरे-जवाहरात से भरा हुआ है. हलाकू ने कहा, 'खाओ.' मुसतआसिम बिल्लाह ने कहा, "हीरे कैसे खाऊं?"
हलाकू ने जवाब दिया, "अगर तुम इन हीरों से अपने सिपाहियों के लिए तलवारें और तीर बना लेते तो मैं नदी पार न कर पाता."
अब्बासी ख़लीफ़ा ने जवाब दिया, "ख़ुदा की यही मर्ज़ी थी." हलाकू ने कहा, "अच्छा तो अब मैं जो तुम्हारे साथ करने जा रहा हूं वो भी ख़ुदा की मर्ज़ी है."
उसने ख़लीफ़ा को नमदों में लपेटकर उसके ऊपर घोड़े दौड़ा दिए ताकि ज़मीन पर ख़ून न बहे.
नौवीं सदी का बग़दाद
बग़दाद की बुनियाद सन 762 में अबू जफ़र बिन अलमंसूर ने बग़दाद नाम के एक छोटे से गांव के क़रीब रखी थी.कुछ ही दशकों के भीतर यह बस्ती दुनिया के इतिहास के बड़े शहरों में शामिल हो गई.
हिंदुस्तान से लेकर मिस्र तक के शिक्षाविद, विद्वान, कवि, दार्शनिक, वैज्ञानिक और विचारक यहां पहुंचने लगे.
इसी ज़माने में मुसलमानों ने चीनियों से काग़ज़ बनाने का तरीक़ा सीख लिया और देखते ही देखते शहर शैक्षिक गतिविधियों से भर गया.
नौवीं सदी में बग़दाद का हर शहरी पढ़ लिख सकता था.
इतिहासकार टरटॉयस चैंडलर के शोध के मुताबिक़ सन 775 से लेकर सन 932 तक जनसंख्या के लिहाज़ से बग़दाद दुनिया का सबसे बड़ा शहर था.
इसके अलावा इसे दस लाख की आबादी तक पहुंचने वाले दुनिया का पहला शहर होने का सम्मान प्राप्त था.
वहां यूनानी, लातिनी, संस्कृत, सीरियन और दूसरी भाषाओं की किताबें भी अनुदित होने लगीं.
यही किताबें सदियों बाद पूरब पहुंचीं और उन्होंने पूरब में अहम किरदार अदा किया. अलजेब्रा, एलगोरिद्म, अलकेमी, अल्कोहल आदि जैसे दर्जनों शब्द बग़दाद की इसे सुनहरे दौर की देन हैं.
बग़दाद में बसने वाली चंद मशहूर हस्तियों के नाम भी देख लीजिए:
जाबिर बिन हय्यान (आधुनिक रसायन शास्त्र के विद्वान),
अल-ख़्वारिज़्मी (बीजगणित के विद्वान),
अल-किंदी और अल-राज़ी (मशहूर दार्शनिक),
अल-ग़ज़ली (मशहूर विचारक),
अबू नुवास (प्रसिद्ध अरबी कवि),
शेख़ सादी (प्रसिद्ध फ़ारसी कवि),
ज़िरयाब ( मशहूर संगीतकार),
तबरी (मशहूर इतिहासकार),
इमाम अबू हनीफ़ा, अलेह रहमा
इमाम अहमद बिन हंबल, अलेह रहमा
इमाम अबू यूसुफ़
आज से ठीक 760 साल पहले बग़दाद पर चलने वाली उस आकस्मिक आंधी ने मेसोपोटामिया की हज़ारों साल पुरानी संस्कृति के क़दम ऐसे उखाड़े कि वो आज तक संभल नहीं पाए.
यही नहीं बल्कि इसके बाद से आज तक कोई मुस्लिम शहर बग़दाद की शानो शौकत तक नहीं पहुंच सका.
कुछ विशेषज्ञों ने लिखा है कि पश्चिमी सभ्यता इसी वजह से फल-फूल सकी कि मंगोलों ने उस वक़्त की बेहतर मुस्लिम सभ्यता को तबाह करके पश्चिम के लिए रास्ता साफ़ कर दिया था.
हलाकु ख़ान मंगोल साम्राज्य के संस्थापक चंगेज़ ख़ान का पोता और उसके चौथे पुत्र तोलुइ ख़ान का पुत्र था। हलाकु की माता सोरग़ोग़तानी बेकी (तोलुइ ख़ान की पत्नी) ने उसे और उसके भाइयों को बहुत निपुणता से पाला और परवारिक परिस्थितियों पर ऐसा नियंत्रण रखा कि हलाकु आगे चलकर एक बड़ा साम्राज्य स्थापित कर सका
हलाकु ख़ान की पत्नी दोक़ुज़ ख़ातून एक नेस्टोरियाई ईसाईथी और हलाकु के इलख़ानी साम्राज्य में बौद्ध धर्म और ईसाई धर्म को बढ़ावा दिया जाता था। दोक़ुज़ ख़ातून ने बहुत कोशिश की के हलाकु भी ईसाई बन जाए लेकिन वह मरते दम तक बौद्ध धर्म का अनुयायी ही रहा।
📮आगे इन शा अल्लाह अगली पोस्ट में
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