सल्तनत ए 🗡️उस्मानिया-भाग-१ ✍🏻मोहम्मद शोएब
पोस्ट नम्बर 1️⃣
जब भी मुलमानों पे जुल्म या जादति होती हे तो सबसे पहले जो आवाज़ बुलंद होती हे वो तुर्की से होती हे रजब तय्यब अर्दोन की_
आखिर किया बात है जो तुर्की अमेरिका को भी आंखे दिखता हे और कहता हे , हमे जंग की धमकी मत देना ,हमारा इतिहास पढलो पहले
आखिर किया बात है जो तुर्की अमेरिका को भी आंखे दिखता हे और कहता हे , हमे जंग की धमकी मत देना ,हमारा इतिहास पढलो पहले
उसकी वजह हे ख़िलाफ़ते उस्मानिया का इतिहास जो आपको पोस्ट by पोस्ट बताऊंगा इन शाह अल्लाह
सल्तनत ए उस्मानिया जिसे ख़िलाफ़त ए उस्मानिया भी कहते हे ईसाई इलाको में इस्लाम के झंडे गाड़ने वाली सल्तनत जिसने सलेबी (ईसाई लस्कर) को वो जख्म दिए की आज तक उससे वो उभर ना पाए , रोम की 1हजार साला हुकूमत को उखाड़ फेंकने ओर कुस्तुन्तुनिया को फतह करके ,इस्लाम की वो दास्तान लिखदी कि आज भी दुश्मन पढ़ कर थर्रा जाता हे, इस सल्तनत ने तक़रीबन 600 साल तक हुकूमत की 1453 से 1922 तक
1922 में सल्तनत उस्मानिया को खत्म करके उसपे पाबंदी लगा के पूरे खानदान को अरब छोड़ने पे मजबूर किया , 100 साल का मुहाइदे में तरह तरह की पाबंदी लगा दी ताके तुर्की फिर कहर बनके ना टूट पड़े ईसाईयो पे , इस मुहाइदे कि उम्र भी मुकम्मल होने वाली हे 2023 में तुर्की फिर से पाबंदियों से आज़ाद हो जाएगा
सल्तनत ए उस्मानिया को हटाना, एक बोहोत बड़ी सलेबी, ईसाई साजिश थी बर्तानवी जासूस हम्फर (hempher) ने इसमें अहम किरदार अदा किया था
में आखिरी पोस्ट में जासूस हम्फर (hempher) पर पोस्ट बनाऊँगा ओर उसी की जबानी उसकी पूरी जासूसी की दास्तान बताउंगा, ओर उसपे कई पोस्ट बनेगी सिर्फ बर्तानिया जासूस ही नही बल्कि मुसलमान कहलाने वाले कई लोग भी शामिल थे । ये सब कैसे हुवा कोन कोन सामिल थे सलेबी जासूस ने किया लिखा वो सब आपको बताऊंगा लेकिन सबसे आखिर में ।
इसलिए कि में इब्तिदा से आगाज़ करना बेहतर समझता हूं ताके पढ़ने वालों को समझने में आसानी हो
1258 ई में ख़िलाफ़ते अब्बासियों का तातारियों (मंगोल) के हाथों कत्ले आम के साथ खत्मा हुवा ओर आखिरी अब्बासी खलीफा मुस्त असीम बिल्लाह को जानवर की खाल में लपेट कर घोडे दौड़ा कर कुचल दिया गया ,,,,।।
है अयां फितना ए तातार के अफसाने से..
पासबां मिल गए काबे को सनम खाने से..!!
बाद में यही तातारी कौम मुसलमान हो गई और तुर्क नस्ल के नाम से मशहूर हुई…
1.. तुर्काने तैमूरी… जिसकी नस्ल में बाबर पैदा हुआ और भारत में मुगल साम्राज्य की बुनियाद डाली।
2.. तुर्काने सफवी… जिसकी हुकूमत ईरान में क़ायम हुई
3.. तुर्काने सलजूकी… इस खानदान की बहुत मजबूत हुकूमत तुर्की के इलाके में…इस्ताम्बूल (कुस्तुनतुनिया ) को छोड़कर.. आसपास क़ायम हुई..!!
वक्त के साथ साथ सलजूकी हुकूमत जब कमजोर होने लगी तो कई छोटी छोटी रियासतों में बंट गई… आसपास मौजूद छोटे सुल्तान… सलजूकी सुल्तान पर हमले करने लगे…. और सन् 1300 ई0 तक सेल्जुकों का पतन हो गया था…!!
इन्ही रियासतों में मगरिबी अनातोलिया की छोटी सी रियासत में ,अल तुगरल, (गाज़ी eurtgul) एक तुर्क सुल्तान थे…!!
एक बार जब वो एशिया माइनर की तरफ़ कूच कर रहे थे तो रास्ते में एक जगह पर दो छोटी फौजों को जंग करते हुए देखा… जिसमें से एक तरफ की फौज शिकस्त के करीब थी… उन्होंने अपनी चार सौ घुड़सवारों की सेना को किस्मत की कसौटी पर आजमाया.. उन्होंने हारते हुए पक्ष का साथ दिया और लडाई जीत ली… उन्होने जिनका साथ दिया वे सल्जूक थे…!!
गाजी अल तुगरल (eurtgul) ही वो पहले सख्स थे जिन्होंने सल्तनत ए उस्मानिया की नींव रखी और आप ही के बेटे गाज़ी उस्मान के नाम से सल्तनत का नाम उस्मानिया रखा गया
गाजी अरतगल(eutugrul) काय काबिले से थे उनके वालिद सुलेमान शाह काय काबिले के सरदार थे ,काय कबीले से सल्तनत ए उस्मानिया बनने तक ओर फिर उसके बाद 600 साल की तारीख पे आने से पहले में आपको तारीख की वो दर्दनाक दास्तान सुनाना चाहता हु जो सियाही से नही खून से लिखी गई
हलाकू का बगदाद पे हमला ओर उसके बाद मंगोलो का वहसी दरिंदापन सायद ही किसी शहर ने ऐसी तबाही देखी हो जो शहरे बगदाद ने देखी ,
ख़िलाफ़त ए अब्बासिया ओर मंगोल हलाकू खान
मंगोलों ने 1258 में बग़दाद पर किया था हमला.
मंगोल फ़ौज ने पिछले 13 दिन से बग़दाद को घेरे में ले रखा था. जब प्रतिरोध की तमाम उम्मीदें दम तोड़ गईं तो 10 फ़रवरी सन 1258 को समर्पण के दरवाज़े खुल गए.
37वें अब्बासी ख़लीफ़ा मुस्तआसिम बिल्लाह अपने मंत्रियों और अधिकारियों के साथ मुख्य दरवाज़े पर आए और हलाकू ख़ान के सामने हथियार डाल दिए.
हलाकू ने वही किया जो उसके दादा चंगेज़ ख़ान पिछली आधी सदी से करते चले आए थे.
उसने ख़लीफ़ा के अलावा तमाम आला ओहदेदारों को मौत के घाट उतार दिया और मंगोल सेना बग़दाद में दाख़िल हो गई.
इसके अगले चंद दिन तक जो हुआ उसका कुछ अंदाज़ा इतिहासकार अब्दुल्ला वस्साफ़ शिराज़ी के शब्दों से लगाया जा सकता है.
वह लिखते हैं, "वो शहर में भूखे गधों की तरह घुस गए और जिस तरह भूखे भेड़िये भेड़ों पर हमला करती हैं वैसा करने लगे. बिस्तर और तकिए चाकूओं से फाड़ दिए गए. महल की औरतें गलियों में घसीटी गईं और उनमें से हर एक तातरियों का खिलौना बनकर रह गईं."
दजला नदी के दोनों किनारों पर आबाद बग़दाद, अलीफ़ लैला का शहर, ख़लीफ़ा हारून अलरशीद का शहर था.
इस बात का सही अंदाजा लगाना मुश्किल है कि कितने लोग इस क़त्लेआम का शिकार हुए. इतिहासकारों का अंदाज़ा है कि दो लाख से लेकर 10 लाख लोग तलवार, तीर या भाले से मार डाले गए थे.
इतिहास की किताबों में लिखा है कि बग़दाद की गलियां लाशों से अटी पड़ी थीं. चंद दिनों के अंदर-अंदर उनसे उठने वाली सड़ांध की वजह से हलाकू ख़ान को शहर से बाहर तम्बू लगाने पर मजबूर होना पड़ा.
इसी दौरान जब विशाल महल को आग लगाई गई तो इसमें इस्तेमाल होने वाली आबनूस और चंदन की क़ीमती लकड़ी की ख़ुशबू आसपास के इलाके के वातावरण में फैली बदबू में मिल गई.
कुछ ऐसी ही दजला नदी में भी देखने को मिला. कहा जाता है कि उस नदी का मटियाला पानी कुछ दिनों तक लाल रंग में बहता रहा और फिर नीला पड़ गया.
लाल रंग की वजह वो ख़ून था जो गलियों से बह-बहकर नदी में मिलता रहा और सियाही इस वजह से कि शहर के सैंकड़ों पुस्तकालयों में महफ़ूज़ दुर्लभ नुस्खे नदी में फेंक दिए गए थे और उनकी सियाही ने घुल-घुलकर नदी के लाल रंग को हल्का कर दिया था.
फ़ारसी के बड़े शायर शेख़ सादी काफ़ी वक़्त बग़दाद में रहे थे और उन्होंने यहां के मदरसे निज़ामिया में तालीम हासिल की थी.
इसलिए उन्होंने बग़दाद के पतन पर यादगार नज़्म लिखी जिस का एक-एक शेर दिल को दहला देता है.
हलाकू ख़ान ने 29 जनवरी सन 1257 को बग़दाद की घेराबंदी की शुरुआत की थी.
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📮आगे इन शा अल्लाह अगली पोस्ट में
✍🏻मोहम्मद शोएब

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