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सल्तनत ए 🗡उस्मानिया-भाग-५ ✍🏻मोहम्मद शोएब

सल्तनत ए 🗡उस्मानिया

पोस्ट नम्बर 5

गाज़ी उस्मान


*जब हम उस्मान ए अव्वल की सूरत में गोरो फिक्र करते हे तो एक फौजी सिपाह सालार ओर सियासी सख्सियत की अहसियत  में बाज़ निहायत ही आला सिफाक का परतों हमे उनकी सख्सियत में नज़र आता हे,

जब ब्रजन्तिनियो ने बुर्सा , ,ममानोस, अदरा , नोस, कस्टला के नसरानी उमरा को 700 हिजरी में दौलत ए उस्मानिया के अरतगल को जंग में सिखस्त देने के लिए एक सलेबी मुहाइदा को तस्किल देने की दावत की ,ओर नसरानी उमरा ने इसकी दावत पर लब्बेक कहते हुवे इस सल्तनत को खतम करने के लिए एका कर लिया ,तो उस्मान गाज़ी अपनी फौजो को लेकर आगे बढे ओर खुद जंग में घुस गए

और सलेबी फौजो को तीतर बितर करके सूजाअत व बहादुरी का वो मुजाहिरा किया के  उस्मानियो के नज़दीक उनकी बहादुरी जर्बुलमिस्ल बन गई

उस्मान गाज़ी जब अपनी कोम के राइस ए आज़म मुकर्रर हुवे तो उन्होंने बोहोत दानाई का मुजाहिरा किया और सुल्तान अलाउद्दीन का सलेबियो से जंग में मज़बूत शहरों और किलो को फतह करने में साथ दिया 

जिसकी वजह से अलाउद्दीन ने उनको बड़ी इज़्ज़त से नवाजा ओर उनको अपने नाम का सिक्का ढलने ओर अपनी मातहत इलाको में अपने नाम का खुतबा पढ़ने की इजाज़त देदी

उस्मान गाज़ी के जेरे-नगी  के इलाको के करीब बसने वाले लोगो को जब इस बात का इल्म हुवा के वो दीने इस्लाम का एक सिपाही है वो इसकी मदद पर कमर्बस्ता  हो गए ओर एक ऐसी इस्लामी सल्तनत के सुतूनो को मुस्तहकम करने के लिए उठ खड़े हुवे जो इस्लाम दुश्मन नसरानी सल्तनत के सामने ना-कबीले ऊबुर दीवार बनकर खड़ी होगई

जब उस्मान गाज़ी ने किलो ओर सहरो को फतह करना सुरु किया तो ये उनकी सख्सियत में बोहोत नुमाया होकर सामने आई । 707  हिज्री में उन्होंने एक बाद एक कटा, लफ़गा, अखिसार ,के किले फतह किए 

712 ह में कुबू ओर तकेर्बबिकाइ वगेरह के किले फतह किए ,इन्ही फतुहात में बुरुसा सहर की फतुहात को आसान बना दिया,,हलाक़े ये मुश्किल तरीन मारका था लेकिन उस्मान गाज़ी के हौसले ओर इस्तिकामत ने फतह का ताज सर पे सजा दिया।

कई साल तक उस्मान गज़ी ओर अमीरे शहर अकीनुस के दरमियान सख्त मार्के हुवे लेकिन बिल आखिर नसरानी सिपाह सालार को सर झुकना पड़ा और शहर गाज़ी उस्मान के हवाले करना पडा , गाज़ी उस्मान का जस्बा इमानि उस वक़्त जादा नुमाया होगया , जब बरसा के सिपहसालार अकेनुस ने उस्मान गाज़ी के बारे में छानबीन की ओर इस्लाम कुबूल किया ।
सुल्तान ने उसे बे का लक़ब दिया ओर वो बाद मे दौलत ए उस्मानिया के मारूफ सिपाहसालार में शामिल हुवा ।

उस्मानियो की साफो में कई नो मुस्लिम सिपाह सालार मुस्लिम बनके आये , 
ओर बोहोत सी इस्लामि जमाअते सल्तनत उस्मानी के झंडे के नीचे हो गई जैसे जमाते गजा रोम यानि रूमी गाज़ी ये वो इस्लामी जमाअत हे जो रोम पर नज़र रखती थी और हमेशा सरहद पर खेमाजम रहती थी। ये जमाअत अब्बासी खिलाफत के दौर से रूमी हमलो के सामने दीवार बनकर ये हिफाज़त कर रही थी हमेसा सरहदों पे रहने की बदौलत रूमियों के खिलाफ जिहाद में इस जमाअत को बड़े बड़े तज़र्बे हासिल हुवे ,

इसी तरह एक ओर जमाअत जो मुक़य्यर हज़रात की थी बड़ी मसहूर है जिसका नाम अल अफयान था वो मुसलमानो की माली मदद करती थी, ,जंग में जरूरत के समान मुहैय्या कराती थी और लश्करों का साथ देती थी

इस जमाअत में शामिल लोग बड़े बड़े ताजिर थे ओर वो इनकी मदद करते थे  तमीरी काम जैसे खानकाहों मसाजिद , वगेरा इस जमाअत में मुमताज़ उलमा भी शामिल थे ,जो   इस्लामी  तहज़ीब की खिदमत का फ़रीज़ा सर अंजाम देते थे और लोगो के दिलो में इस्लाम के लिए जस्बा पैदा करते थे

एक जमाअत ओर थी जो हाजियो पे मुस्तमिल थी

जिसका नाम हाजियाते रूम यानी हुज्जाजे अर्ज़े रूम इस जमात का काम इस्लामी सउर की बेदारी इस्लामि उलूम की तरबीजो इसयात ओर इस्लामी तसरियतो क़वानीन में गहरी बसिरत पैदा करना था

इनके अलावा कई दूसरी जमाअते भी  जिनका हदफ़ मुसलमानो की बिल उमुम मदद करना था

एक वाकिया बोहोत मसहूर हे ,,उस्मान गाज़ी के अदल इंसाफ का जिसकी वजह से एक परिवार मुसलमान हुवा

उस्मान गाज़ी के पास एक मुसलमान और ईसाई आया और इंसाफ की दरखुवास्त की उस्मान गाज़ी ने फैसला हक़ करते हुवे ईसाई के हक़ में किया ,,जिससे ब्रेजेंटाइन परिवार मुसलमान हो गया

उस्मान गाज़ी हमेसा उलमा से मशवरा करते थे , ओर अपनी रियाया के साथ अदल से काम लेते ,जो मुसलमान नही उन्हें इस्लाम की दावत जरूर देते और कई आपके इंसाफ की वजह से मुसलमान हुवे

उस्मान गाज़ी की अपने बेटे को नसीहत आज भी तारीख में पढ़ी जा सकती हे
जिसका हम मुताला कर सकते है
जिसमे तहज़ीबी ओर सराई तरीके-कार जिसपे बाद में उस्मानी सल्तनत कायम रही 

गाज़ी उस्मान जब बिस्तरे मर्ज पे थे, तो इन्होंने अपने बेटे को वसीयत करते हुवे कहा था
आए बेटे किसी ऐसे काम मे मसरूफ ना होना जिसके करने का परवर दिगार ए आलम ने हुक्म ना दिया हो,,

जब भी सल्तनत में कोई मुश्किल पेस आये तो उलमा ए इकराम से मशवरा लेना और उनसे इमदाद तलब करना 

ए बेटे फरमा-बरदार लोगो को एज़ाज़ से नवाजना , फौजो पर इनामों इकराम करना ,कही सीपा ओर दौलत की वजह से सैतान तुम्हे दोखे में ना डाल दे, अहले सरियत से दूर होने से ऐतराज़ करना,

बेटा आप जानते हे हमारा मकसद रब्बुल-आलमीन की रज़ा हे और ये के हम जिहाद के जरीए तमाम आफाक में अपने दीन के नूर को आम करदे

लिहाज़ा वही बात करना जिसमे अल्लाह करीम की खुशनूदी हो ,बेटा हम वो लोग नही जो लोगो को गुलाम बनाने के लिए जंग करते हे, हमे जिंदा रहना हे तो इस्लाम की खातिर ,मरना है तो इस्लाम की खातिर ,
ओर ये है वो चीज़ मेरे बेटे जिसका तू एहल हे

ये वसीयत एक जाब्ता थी जिसपे बाद में उस्मानि अमल पहरा रहे

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उस्मान गाज़ी के बेटे ओरहान गाज़ी की दास्तान

📮आगे इन शा अल्लाह अगली पोस्ट में

✍🏻मोहम्मद शोएब

About Author Mohamed Abu 'l-Gharaniq

when an unknown printer took a galley of type and scrambled it to make a type specimen book. It has survived not only five centuries.

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