इस्लाम से जुड़े कुछ सवाल जवाब भाग-२
========*तकदीर ( किस्मत )*========
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*सवाल:-* तकदीर किसे कहते हैं?*जवाब:-* दुनिया में जो कुछ होता है और बंदे ( लोग ) जो कुछ भलाई बुराई करते हैं अल्लाह पाक ﷻ ने उसे अपने इल्म ( ज्ञान ) के मुवाफिक पहले से लिख लिया है उसे तकदीर कहते हैं।
*सवाल:-* क्या अल्लाह पाक ﷻ ने जैसा हमारी तकदीर में लिख दिया है हमें मजबूरन वैसा करना पड़ता है?
*जवाब:-* अल्लाह पाक ﷻ के लिख देने से हमें मजबूरन वैसा नहीं करना पड़ता है बल्कि हम जैसा करने वाले थे अल्लाह पाक ﷻ ने अपने इल्म ( ज्ञान ) से वैसा लिख दिया। अगर किसी की तकदीर में बुराई लिखी तो इसलिए के वह बुराई करने वाला था अगर भलाई करने वाला होता तो अल्लाह पाक ﷻ उसकी तकदीर में भलाई लिखता। खुलासा यह हुआ अल्लाह पाक ﷻ के लिख देने से बंदा किसी काम के करने पर मजबूर नहीं किया गया। तकदीर सच है उसका इंकार करने वाला गुमराह बदमज़हब है।
*हवाला* ( शरह फिका अकबर, बहारे शरीयत )
*जवाब:-* अल्लाह पाक ﷻ के लिख देने से हमें मजबूरन वैसा नहीं करना पड़ता है बल्कि हम जैसा करने वाले थे अल्लाह पाक ﷻ ने अपने इल्म ( ज्ञान ) से वैसा लिख दिया। अगर किसी की तकदीर में बुराई लिखी तो इसलिए के वह बुराई करने वाला था अगर भलाई करने वाला होता तो अल्लाह पाक ﷻ उसकी तकदीर में भलाई लिखता। खुलासा यह हुआ अल्लाह पाक ﷻ के लिख देने से बंदा किसी काम के करने पर मजबूर नहीं किया गया। तकदीर सच है उसका इंकार करने वाला गुमराह बदमज़हब है।
*हवाला* ( शरह फिका अकबर, बहारे शरीयत )
*अनवारे शरीयत* उन्वान *तकदीर ( किस्मत )* पेज:11
====== *मरने के बाद ज़िंदा होना* ======
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*सवाल:-* मरने के बाद ज़िंदा होने का मतलब क्या है?
*जवाब:-* मरने के बाद ज़िंदा होने का मतलब ये है के कयामत के दिन जब ज़मीन, आसमान, इंसान और फरिश्ते वगैरा सब फना ( खत्म ) हो जाएंगे तो फिर अल्लाह पाक ﷻ जब चाहेगा हज़रत इस्राफील علیہ السلام को ज़िंदा फरमाएगा वह दोबारा सूर फूकेंगे तो सब चीज़े मौजूद होजाएंगी फरिश्ते और आदमी वगैरा सब ज़िंदा होजाएंगे। मुर्दे अपनी—अपनी क़ब्रों से उठेंगे हश्र के मैदान में अल्लाह ﷻ पाक के सामने पेशी होगी। हिसाब लिया जाएगा और हर शख्स को अच्छे बुरे कामों का बदला दिया जाएगा। यानी अच्छों को जन्नत ( स्वर्ग ) मिलेगी और बुरों को जहन्नम ( नरक ) में भेज दिया जाएगा। हिसाब और जन्नत दोज़ख़ ( स्वर्ग—नरक ) सच हैं इन का इंकार करने वाला काफिर है। ( मुसलमान नहीं )
*हवाला* ( बहारे शरीयत )
*अनवारे शरीयत* उन्वान *मरने के बाद ज़िंदा होना* पेज:11-12
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*सवाल:-* मरने के बाद ज़िंदा होने का मतलब क्या है?
*जवाब:-* मरने के बाद ज़िंदा होने का मतलब ये है के कयामत के दिन जब ज़मीन, आसमान, इंसान और फरिश्ते वगैरा सब फना ( खत्म ) हो जाएंगे तो फिर अल्लाह पाक ﷻ जब चाहेगा हज़रत इस्राफील علیہ السلام को ज़िंदा फरमाएगा वह दोबारा सूर फूकेंगे तो सब चीज़े मौजूद होजाएंगी फरिश्ते और आदमी वगैरा सब ज़िंदा होजाएंगे। मुर्दे अपनी—अपनी क़ब्रों से उठेंगे हश्र के मैदान में अल्लाह ﷻ पाक के सामने पेशी होगी। हिसाब लिया जाएगा और हर शख्स को अच्छे बुरे कामों का बदला दिया जाएगा। यानी अच्छों को जन्नत ( स्वर्ग ) मिलेगी और बुरों को जहन्नम ( नरक ) में भेज दिया जाएगा। हिसाब और जन्नत दोज़ख़ ( स्वर्ग—नरक ) सच हैं इन का इंकार करने वाला काफिर है। ( मुसलमान नहीं )
*हवाला* ( बहारे शरीयत )
*अनवारे शरीयत* उन्वान *मरने के बाद ज़िंदा होना* पेज:11-12
======= *शिर्क व कुफ्र का बयान* =======
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*सवाल:-* शिर्क किसे कहते हैं?
*जवाब:-* अल्लाह पाक ﷻ की ज़ात व सिफात में किसी को शरीक ठहराना शिर्क है।
1:- ज़ात में शरीक ठहराने का मतलब ये है के 2 या 2 से ज़्यादा खुदा मानना। जैसे के *ईसाई* जो के 3 खुदा मान कर मुशरिक हुए और जैसे हिन्दू के कई खुदा मानने के सबब मुशरिक हैं।
और सिफात।
2:- सिफात की तरह किसी दूसरे के लिए सिफ्त साबित करना मसलन समा और बसर वगैरा जैसा के खुदा ए पाक ﷻ के लिए बगैर किसी के दिए जाती तौर पर साबित है। इसी तरह किसी दूसरे के लिए समा और बसर वगैरा ज़ाती तौर पर माने के बगैर अल्लाह पाक ﷻ के दिए उसे ये सिफ्तें खुद हासिल हैं तो शिरक है और अगर किसी दूसरे के लिए अताई ( अनुदान ) तौर पर माने के अल्लाह ﷻ पाक ने उसे ये सिफ्तें दी हैं तो शिर्क नहीं जैसा के अल्लाह पाक ने खुद इंसान के बारे में फरमाया : ( पारह 29 रुकू 19 ) तर्जुमा : हमने इंसान को समा और बसीर बनाया।
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*सवाल:-* शिर्क किसे कहते हैं?
*जवाब:-* अल्लाह पाक ﷻ की ज़ात व सिफात में किसी को शरीक ठहराना शिर्क है।
1:- ज़ात में शरीक ठहराने का मतलब ये है के 2 या 2 से ज़्यादा खुदा मानना। जैसे के *ईसाई* जो के 3 खुदा मान कर मुशरिक हुए और जैसे हिन्दू के कई खुदा मानने के सबब मुशरिक हैं।
और सिफात।
2:- सिफात की तरह किसी दूसरे के लिए सिफ्त साबित करना मसलन समा और बसर वगैरा जैसा के खुदा ए पाक ﷻ के लिए बगैर किसी के दिए जाती तौर पर साबित है। इसी तरह किसी दूसरे के लिए समा और बसर वगैरा ज़ाती तौर पर माने के बगैर अल्लाह पाक ﷻ के दिए उसे ये सिफ्तें खुद हासिल हैं तो शिरक है और अगर किसी दूसरे के लिए अताई ( अनुदान ) तौर पर माने के अल्लाह ﷻ पाक ने उसे ये सिफ्तें दी हैं तो शिर्क नहीं जैसा के अल्लाह पाक ने खुद इंसान के बारे में फरमाया : ( पारह 29 रुकू 19 ) तर्जुमा : हमने इंसान को समा और बसीर बनाया।
*अनवारे शरीयत* उन्वान *शिर्क व कुफ्र का बयान* पेज:12
*सवाल:-* कुफ्र किसे कहते हैं?
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*जवाब:-* जरूरीयाते दीन में से किसी एक बात का इनकार करना कुफ्र है। जरूरीयाते दीन बहुत हैं इन में से कुछ ये हैं
अल्लाह ﷻ पाक को एक और वाजीबुल वजूद मानना। उसकी ज़ात व सिफात में किसी को शरीक ना समझना, ज़ुल्म और झूठ वगैरा तमाम एबों से उसको पाक मानना, उसके मलाइका और उसकी तमाम किताबों को मानना, कुरान मजीद की हर एक आयत को सच समझना हुज़ूर साय्यदे (ﷺ) आलम और तमाम अंबिया ए किराम علیہ السلام की नुब्ववत को तस्लीम करना, इन सब को अज़मत वाला जानना इन्हें ज़लील और छोटा ना—समझना इनकी हर बात जो याकीनी तौर पर साबित हो उसे सच मानना। हुज़ूर (ﷺ) को खातिमुन्नाबिय्यीन ( आखरी नबी ) मानना। इनके बाद किसी नबी के पैदा होने जो जायज़ ना—समझना, कयामत,हिसाब व किताब और जन्नत दोज़ख् को सच मानना, नमाज़ रोज़ा और हज व ज़कात की फरजिय्यत को तस्लीम करना, ज़िना चोरी और शराब नोशी वगैरा हराम और बहुत बुरा मानना और कुफ्र को कुफ्र जानना वगैरा।
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*जवाब:-* जरूरीयाते दीन में से किसी एक बात का इनकार करना कुफ्र है। जरूरीयाते दीन बहुत हैं इन में से कुछ ये हैं
अल्लाह ﷻ पाक को एक और वाजीबुल वजूद मानना। उसकी ज़ात व सिफात में किसी को शरीक ना समझना, ज़ुल्म और झूठ वगैरा तमाम एबों से उसको पाक मानना, उसके मलाइका और उसकी तमाम किताबों को मानना, कुरान मजीद की हर एक आयत को सच समझना हुज़ूर साय्यदे (ﷺ) आलम और तमाम अंबिया ए किराम علیہ السلام की नुब्ववत को तस्लीम करना, इन सब को अज़मत वाला जानना इन्हें ज़लील और छोटा ना—समझना इनकी हर बात जो याकीनी तौर पर साबित हो उसे सच मानना। हुज़ूर (ﷺ) को खातिमुन्नाबिय्यीन ( आखरी नबी ) मानना। इनके बाद किसी नबी के पैदा होने जो जायज़ ना—समझना, कयामत,हिसाब व किताब और जन्नत दोज़ख् को सच मानना, नमाज़ रोज़ा और हज व ज़कात की फरजिय्यत को तस्लीम करना, ज़िना चोरी और शराब नोशी वगैरा हराम और बहुत बुरा मानना और कुफ्र को कुफ्र जानना वगैरा।
*अनवारे शरीयत* उन्वान *शिर्क व कुफ्र का बयान* पेज:12-13

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