कुर-आनी आयातका गुण तथा फाइदाहरु (अन्तिम खण्ड )
########सुरह मूल्कक गुण तथा फाइदा हरु ########
हजरत सय्येदुना इब्न अब्बास رضی اللہ عنہما वर्णन गर्नु हुन्छ "एकजना साहाबीले एउटा कबर(चिहान)मा आफ्नो पाल (खैमा) लगाउनु भयो तर वहालाई यो थाहा थियन कि यहाँ कुनै कबर(चिहान)छ भनेर पछि थहा पाउनु भयो कि यहाँ कुनै वेक्तिको कबर(चिहान) छ भनी जसले सुरह मुल्क पढी रहेको छ यहाँ सम्मकि उसले पुरा सुरह मुल्क पढेर भ्याउछ "
उनै शहाबिले रसुलअल्लाह صلی اللہ علیہ و سلم को दरबारमा हाजिर हुदै भन्नु भयो "या रसुलअल्लाह صلی اللہ علیہ و سلم मैले एउटा कबर (चिहान )मा आफ्नो पाल (खैमा ) गाडेको थियो मलाइ यो थाहा थियन कि त्यहा कसैको कबर(चिहान) छ भनि जुन कबरवालाले हरेक दिन सूरेह मूल्कको पूर्ण पाठ पढने गर्दा थियो "
रसुलअल्लाह صلی اللہ علیہ و سلم को मधुर कथन छ "यहि रोक्ने वाला हो ,यहि छेक्ने वाला हो ,यहि मुक्ति दिने वाला हो जसलाई यसले कबर (चिहान)को पिडाबाट सुरक्षित राखेक छ "
*📚Sunan Tirmizi, Hadees # 2899.*
रसुलअल्लाह صلی اللہ علیہ و سلم को मुखारबिन्दु छ"
"अवस्य कुर-आन ३० आयातहरुमा समावेश एउटा सुरह रहेको छ जसले उसलाई पढने (कारी) का निम्ति सिफारिश गरि रहने छ यहा सम्म कि उसलाई (कारी) क्षमा गरिने छ र यो تبٰرک الذئ بیدہ الملک हो "
★ تَبٰرَكَ الَّذِیْ بِیَدِهِ الْمُلْكُ٘- وَ هُوَ عَلٰى كُلِّ شَیْءٍ قَدِیْرُۙ(ﰳ۱)
☆ Kanzul Iman अनुवाद
◆ बड़ी बरकत वाला है वह जिसके क़ब्ज़ा में सारा मुल्क (फ़2) और वह हर चीज़ पर क़ादिर है।
( AL-MULK - 67:1 )
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★ الَّذِیْ خَلَقَ الْمَوْتَ وَ الْحَیٰوةَ لِیَبْلُوَكُمْ اَیُّكُمْ اَحْسَنُ عَمَلًاؕ-وَ هُوَ الْعَزِیْزُ الْغَفُوْرُۙ(۲)
☆ Kanzul Iman अनुवाद
◆ वह जिसने मौत और ज़िन्दगी पैदा की कि तुम्हारी जांच हो (फ़3) तुम में किसका काम ज़्यादा अच्छा है (फ़4) और वही इज़्ज़त वाला बख़्शिश वाला है।
( AL-MULK - 67:2 )
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★ الَّذِیْ خَلَقَ سَبْعَ سَمٰوٰتٍ طِبَاقًاؕ-مَا تَرٰى فِیْ خَلْقِ الرَّحْمٰنِ مِنْ تَفٰوُتٍؕ-فَارْجِعِ الْبَصَرَۙ-هَلْ تَرٰى مِنْ فُطُوْرٍ(۳)
☆ Kanzul Iman अनुवाद
◆ जिसने सात आसमान बनाए एक के ऊपर दूसरा, तो रहमान के बनाने में क्या फ़र्क़ देखता है (फ़5) तू निगाह उठा कर देख (फ़6) तुझे कोई रख़्ना नज़र आता है।
( AL-MULK - 67:3 )
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★ ثُمَّ ارْجِعِ الْبَصَرَ كَرَّتَیْنِ یَنْقَلِبْ اِلَیْكَ الْبَصَرُ خَاسِئًا وَّ هُوَ حَسِیْرٌ(۴)
☆ Kanzul Iman अनुवाद :
◆ फिर दुबारा निगाह उठा (फ़7) नज़र तेरी तरफ़ नाकाम पलट आयेगी थकी मांदी। (फ़8)
( AL-MULK - 67:4 )
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★ وَ لَقَدْ زَیَّنَّا السَّمَآءَ الدُّنْیَا بِمَصَابِیْحَ وَ جَعَلْنٰهَا رُجُوْمًا لِّلشَّیٰطِیْنِ وَ اَعْتَدْنَا لَهُمْ عَذَابَ السَّعِیْرِ(۵)
☆ Kanzul Iman अनुवाद :
◆ और बेशक हमने नीचे के आसमान को (फ़9) चराग़ों से आरास्ता किया (फ़10) और उन्हें शैतानों के लिये मार किया (फ़11) और उनके लिये (फ़12) भड़कती आग का अज़ाब तैयार फ़रमाया। (फ़13)
( AL-MULK - 67:5 )
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★ وَ لِلَّذِیْنَ كَفَرُوْا بِرَبِّهِمْ عَذَابُ جَهَنَّمَؕ-وَ بِئْسَ الْمَصِیْرُ(۶)
☆ Kanzul Iman अनुवाद :
◆ और जिन्होंने अपने रब के साथ कुफ़्र किया (फ़14) उनके लिये जहन्नम का अज़ाब है और क्या ही बुरा अंजाम।
( AL-MULK - 67:6 )
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★ اِذَاۤ اُلْقُوْا فِیْهَا سَمِعُوْا لَهَا شَهِیْقًا وَّ هِیَ تَفُوْرُۙ(۷)
☆ Kanzul Iman अनुवाद :
◆ जब उसमें डाले जायेंगे उसका रेंकना सुनेंगे कि जोश मारती है।
( AL-MULK - 67:7 )
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★ تَكَادُ تَمَیَّزُ مِنَ الْغَیْظِؕ-كُلَّمَاۤ اُلْقِیَ فِیْهَا فَوْجٌ سَاَلَهُمْ خَزَنَتُهَاۤ اَلَمْ یَاْتِكُمْ نَذِیْرٌ(۸)
☆ Kanzul Iman अनुवाद :
◆ मालूम होता है कि शिद्दते ग़ज़ब में फट जायेगी जब कभी कोई गरोह उसमें डाला जायेगा उसके दारोग़ा (फ़15) उनसे पूछेंगे क्या तुम्हारे पास कोई डर सुनाने वाला न आया था। (फ़16)
( AL-MULK - 67:8 )
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★ قَالُوْا بَلٰى قَدْ جَآءَنَا نَذِیْرٌ ﳔ فَكَذَّبْنَا وَ قُلْنَا مَا نَزَّلَ اللّٰهُ مِنْ شَیْءٍ ۚۖ-اِنْ اَنْتُمْ اِلَّا فِیْ ضَلٰلٍ كَبِیْرٍ(۹)
☆ Kanzul Iman अनुवाद :
◆ कहेंगे क्यों नहीं बेशक हमारे पास डर सुनाने वाले तशरीफ़ लाये (फ़17) फिर हमने झुठलाया और कहा अल्लाह ने कुछ नहीं उतारा तुम तो नहीं मगर बड़ी गुमराही में।
( AL-MULK - 67:9 )
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★ وَ قَالُوْا لَوْ كُنَّا نَسْمَعُ اَوْ نَعْقِلُ مَا كُنَّا فِیْۤ اَصْحٰبِ السَّعِیْرِ(۱۰)
☆ Kanzul Iman अनुवाद :
◆ और कहेंगे अगर हम सुनते या समझते (फ़18) तो दोज़ख़ वालों में न होते।
( AL-MULK - 67:10 )
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★ فَاعْتَرَفُوْا بِذَنْۢبِهِمْۚ-فَسُحْقًا لِّاَصْحٰبِ السَّعِیْرِ(۱۱)
☆ Kanzul Iman अनुवाद :
◆ अब अपने गुनाह का इक़रार किया (फ़19) तो फिटकार हो दोज़ख़ियों को।
( AL-MULK - 67:11 )
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★ اِنَّ الَّذِیْنَ یَخْشَوْنَ رَبَّهُمْ بِالْغَیْبِ لَهُمْ مَّغْفِرَةٌ وَّ اَجْرٌ كَبِیْرٌ(۱۲)
☆ Kanzul Iman अनुवाद :
◆ बेशक वह जो बे-देखे अपने रब से डरते हैं (फ़20) उनके लिये बख़्शिश और बड़ा सवाब है। (फ़21)
( AL-MULK - 67:12 )
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★ وَ اَسِرُّوْا قَوْلَكُمْ اَوِ اجْهَرُوْا بِهٖؕ-اِنَّهٗ عَلِیْمٌۢ بِذَاتِ الصُّدُوْرِ(۱۳)
☆ Kanzul Iman अनुवाद :
◆ और तुम अपनी बात आहिस्ता कहो या आवाज़ से वह तो दिलों की जानता है। (फ़22)
( AL-MULK - 67:13 )
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★ اَلَا یَعْلَمُ مَنْ خَلَقَؕ-وَ هُوَ اللَّطِیْفُ الْخَبِیْرُ۠(۱۴)
☆ Kanzul Iman अनुवाद :
◆ क्या वह न जाने जिसने पैदा किया (फ़23) और वही है हर बारीकी जानता ख़बरदार।
( AL-MULK - 67:14 )
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★ هُوَ الَّذِیْ جَعَلَ لَكُمُ الْاَرْضَ ذَلُوْلًا فَامْشُوْا فِیْ مَنَاكِبِهَا وَ كُلُوْا مِنْ رِّزْقِهٖؕ-وَ اِلَیْهِ النُّشُوْرُ(۱۵)
☆ Kanzul Iman अनुवाद :
◆ वही है जिसने तुम्हारे लिये ज़मीन राम कर दी तो उसके रस्तों में चलो और अल्लाह की रोज़ी में से खाओ (फ़24) और उसी की तरफ़ उठना है। (फ़25)
( AL-MULK - 67:15 )
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★ ءَاَمِنْتُمْ مَّنْ فِی السَّمَآءِ اَنْ یَّخْسِفَ بِكُمُ الْاَرْضَ فَاِذَا هِیَ تَمُوْرُۙ(۱۶)
☆ Kanzul Iman अनुवाद :
◆ क्या तुम उससे निडर हो गए जिसकी सल्तनत आसमान में है कि तुम्हें ज़मीन में धंसा दे (फ़26) जभी वह कांपती रहे। (फ़27)
( AL-MULK - 67:16 )
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★ اَمْ اَمِنْتُمْ مَّنْ فِی السَّمَآءِ اَنْ یُّرْسِلَ عَلَیْكُمْ حَاصِبًاؕ-فَسَتَعْلَمُوْنَ كَیْفَ نَذِیْرِ(۱۷)
☆ Kanzul Iman अनुवाद :
◆ या तुम निडर हो गए उससे जिसकी सल्तनत आसमान में है कि तुम पर पथराव भेजे (फ़28) तो अब जानोगे (फ़29) कैसा था मेरा डराना।
( AL-MULK - 67:17 )
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★ وَ لَقَدْ كَذَّبَ الَّذِیْنَ مِنْ قَبْلِهِمْ فَكَیْفَ كَانَ نَكِیْرِ(۱۸)
☆ Kanzul Iman अनुवाद :
◆ और बेशक उनसे अगलों ने झुठलाया (फ़30) तो कैसा हुआ मेरा इन्कार। (फ़31)
( AL-MULK - 67:18 )
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★ اَوَ لَمْ یَرَوْا اِلَى الطَّیْرِ فَوْقَهُمْ صٰٓفّٰتٍ وَّ یَقْبِضْنَﰉ مَا یُمْسِكُهُنَّ اِلَّا الرَّحْمٰنُؕ-اِنَّهٗ بِكُلِّ شَیْءٍۭ بَصِیْرٌ(۱۹)
☆ Kanzul Iman अनुवाद :
◆ और क्या उन्होंने अपने ऊपर परिन्दे न देखे पर फैलाते (फ़32) और समेटते उन्हें कोई नहीं रोकता (फ़33) सिवा रहमान के (फ़34) बेशक वह सब कुछ देखता है।
( AL-MULK - 67:19 )
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★ اَمَّنْ هٰذَا الَّذِیْ هُوَ جُنْدٌ لَّكُمْ یَنْصُرُكُمْ مِّنْ دُوْنِ الرَّحْمٰنِؕ-اِنِ الْكٰفِرُوْنَ اِلَّا فِیْ غُرُوْرٍۚ(۲۰)
☆ Kanzul Iman अनुवाद :
◆ या वह कौन सा तुम्हारा लश्कर है कि रहमान के मुक़ाबिल तुम्हारी मदद करे (फ़35) काफ़िर नहीं मगर धोखे में। (फ़36)
( AL-MULK - 67:20 )
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★ اَمَّنْ هٰذَا الَّذِیْ یَرْزُقُكُمْ اِنْ اَمْسَكَ رِزْقَهٗۚ-بَلْ لَّجُّوْا فِیْ عُتُوٍّ وَّ نُفُوْرٍ(۲۱)
☆ Kanzul Iman अनुवाद :
◆ या कौन सा ऐसा है जो तुम्हें रोज़ी दे अगर वह अपनी रोज़ी रोक ले (फ़37) बल्कि वह सरकश और नफ़रत में ढ़ीट बने हुए हैं। (फ़38)
( AL-MULK - 67:21 )
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★ اَفَمَنْ یَّمْشِیْ مُكِبًّا عَلٰى وَجْهِهٖۤ اَهْدٰۤى اَمَّنْ یَّمْشِیْ سَوِیًّا عَلٰى صِرَاطٍ مُّسْتَقِیْمٍ(۲۲)
☆ Kanzul Iman अनुवाद :
◆ तो क्या वह जो अपने मुंह के बल औंधा चले (फ़39) ज़्यादा राह पर है या वह जो सीधा चले (फ़40) सीधी राह पर। (फ़41)
( AL-MULK - 67:22 )
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★ قُلْ هُوَ الَّذِیْۤ اَنْشَاَكُمْ وَ جَعَلَ لَكُمُ السَّمْعَ وَ الْاَبْصَارَ وَ الْاَفْـٕدَةَؕ-قَلِیْلًا مَّا تَشْكُرُوْنَ(۲۳)
☆ Kanzul Iman अनुवाद :
◆ तुम फ़रमाओ (फ़42) वही है जिसने तुम्हें पैदा किया और तुम्हारे लिये कान और आंख और दिल बनाए (फ़43) कितना कम हक़ मानते हो। (फ़44)
( AL-MULK - 67:23 )
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★ قُلْ هُوَ الَّذِیْ ذَرَاَكُمْ فِی الْاَرْضِ وَ اِلَیْهِ تُحْشَرُوْنَ(۲۴)
☆ Kanzul Iman अनुवाद :
◆ तुम फ़रमाओ वही है जिसने ज़मीन में तुम्हें फैलाया और उसी की तरफ़ उठाए जाओगे। (फ़45)
( AL-MULK - 67:24 )
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★ وَ یَقُوْلُوْنَ مَتٰى هٰذَا الْوَعْدُ اِنْ كُنْتُمْ صٰدِقِیْنَ(۲۵)
☆ Kanzul Iman अनुवाद :
◆ और कहते हैं (फ़46) यह वादा (फ़47) कब आयेगा अगर तुम सच्चे हो।
( AL-MULK - 67:25 )
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★ قُلْ اِنَّمَا الْعِلْمُ عِنْدَ اللّٰهِ۪-وَ اِنَّمَاۤ اَنَا نَذِیْرٌ مُّبِیْنٌ(۲۶)
☆ Kanzul Iman अनुवाद :
◆ तुम फ़रमाओ यह इल्म तो अल्लाह के पास है और मैं तो यही साफ़ डर सुनाने वाला हूं। (फ़48)
( AL-MULK - 67:26 )
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★ فَلَمَّا رَاَوْهُ زُلْفَةً سِیْٓــٴَـتْ وُجُوْهُ الَّذِیْنَ كَفَرُوْا وَ قِیْلَ هٰذَا الَّذِیْ كُنْتُمْ بِهٖ تَدَّعُوْنَ(۲۷)
☆ Kanzul Iman अनुवाद :
◆ फिर जब उसे (फ़49) पास देख़ेंगे काफ़िरों के मुंह बिगड़ जायेंगे (फ़50) और उनसे फ़रमाया दिया जायेगा (फ़51) यह है जो तुम मांगते थे। (फ़52)
( AL-MULK - 67:27 )
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★ قُلْ اَرَءَیْتُمْ اِنْ اَهْلَكَنِیَ اللّٰهُ وَ مَنْ مَّعِیَ اَوْ رَحِمَنَاۙ-فَمَنْ یُّجِیْرُ الْكٰفِرِیْنَ مِنْ عَذَابٍ اَلِیْمٍ(۲۸)
☆ Kanzul Iman अनुवाद :
◆ तुम फ़रमाओ (फ़53) भला देखो तो अगर अल्लाह मुझे और मेरे साथ वालों को (फ़54) हलाक कर दे या हम पर रहम फ़रमाए (फ़55) तो वह कौन सा है जो काफ़िरों को दुःख के अज़ाब से बचा लेगा। (फ़56)
( AL-MULK - 67:28 )
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★ قُلْ هُوَ الرَّحْمٰنُ اٰمَنَّا بِهٖ وَ عَلَیْهِ تَوَكَّلْنَاۚ-فَسَتَعْلَمُوْنَ مَنْ هُوَ فِیْ ضَلٰلٍ مُّبِیْنٍ(۲۹)
☆ Kanzul Iman अनुवाद :
◆ तुम फ़रमाओ वही रहमान है (फ़57) हम उस पर ईमान लाये और उसी पर भरोसा किया तो अब जान जाओगे (फ़58) कौन ख़ुली गुमराही में है।
( AL-MULK - 67:29 )
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★ قُلْ اَرَءَیْتُمْ اِنْ اَصْبَحَ مَآؤُكُمْ غَوْرًا فَمَنْ یَّاْتِیْكُمْ بِمَآءٍ مَّعِیْنٍ۠(۳۰)
☆ Kanzul Iman अनुवाद
◆ तुम फ़रमाओ भला देखो तो अगर सुबह को तुम्हारा पानी ज़मीन में धंस जाये (फ़59) तो वह कौन है जो तुम्हें पानी ला दे निगाह के सामने बहता। (फ़60)
( AL-MULK - 67:30 )
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########सुरह यासिनका गुण तथा फाइदाहरु #########
★ بِسْمِ اللّٰهِ الرَّحْمٰنِ الرَّحِیْمِ
☆अनुवाद हिन्दि कन्जुल इमान
◆ अल्लाह के नाम से शुरू जो निहायत मेहरबान रहम वाला। (फ़1)
( YASIN - 36:0 )
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★ یٰسٓۚ(۱)
☆अनुवाद हिन्दि कन्जुल इमान
◆ “यासीन”।
( YASIN - 36:1 )
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★ وَ الْقُرْاٰنِ الْحَكِیْمِۙ(۲)
☆अनुवाद हिन्दि कन्जुल इमान
◆ हिक्मत वाले क़ुरआन की क़सम।
( YASIN - 36:2 )
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★ اِنَّكَ لَمِنَ الْمُرْسَلِیْنَۙ(۳)
☆अनुवाद हिन्दि कन्जुल इमान
◆ बेशक तुम। (फ़2)
( YASIN - 36:3 )
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★ عَلٰى صِرَاطٍ مُّسْتَقِیْمٍؕ(۴)
☆अनुवाद हिन्दि कन्जुल इमान
◆ सीधी राह पर भेजे गए हो। (फ़3)
( YASIN - 36:4 )
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★ تَنْزِیْلَ الْعَزِیْزِ الرَّحِیْمِۙ(۵)
☆अनुवाद हिन्दि कन्जुल इमान
◆ इज़्ज़त वाले मेहरबान का उतारा हुआ।
( YASIN - 36:5 )
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★ لِتُنْذِرَ قَوْمًا مَّاۤ اُنْذِرَ اٰبَآؤُهُمْ فَهُمْ غٰفِلُوْنَ(۶)
☆अनुवाद हिन्दि कन्जुल इमान
◆ ताकि तुम उस क़ौम को डर सुनाओ जिसके बाप दादा न डराए गए (फ़4) तो वह बेख़बर हैं।
( YASIN - 36:6 )
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★ لَقَدْ حَقَّ الْقَوْلُ عَلٰۤى اَكْثَرِهِمْ فَهُمْ لَا یُؤْمِنُوْنَ(۷)
☆अनुवाद हिन्दि कन्जुल इमान
◆ बेशक उनमें अक्सर पर बात साबित हो चुकी है (फ़5) तो वह ईमान न लायेंगे। (फ़6)
( YASIN - 36:7 )
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★ اِنَّا جَعَلْنَا فِیْۤ اَعْنَاقِهِمْ اَغْلٰلًا فَهِیَ اِلَى الْاَذْقَانِ فَهُمْ مُّقْمَحُوْنَ(۸)
☆अनुवाद हिन्दि कन्जुल इमान
◆ हमने उनकी गर्दनों में तौक़ कर दिये हैं कि वह ठोड़ियों तक हैं तो यह अब ऊपर को मुंह उठाए रह गए। (फ़7)
( YASIN - 36:8 )
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★ وَ جَعَلْنَا مِنْۢ بَیْنِ اَیْدِیْهِمْ سَدًّا وَّ مِنْ خَلْفِهِمْ سَدًّا فَاَغْشَیْنٰهُمْ فَهُمْ لَا یُبْصِرُوْنَ(۹)
☆अनुवाद हिन्दि कन्जुल इमान
◆ और हमने उनके आगे दीवार बना दी और उनके पीछे एक दीवार और उन्हें ऊपर से ढ़ांक दिया तो उन्हें कुछ नहीं सूझता। (फ़8)
( YASIN - 36:9 )
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★ وَ سَوَآءٌ عَلَیْهِمْ ءَاَنْذَرْتَهُمْ اَمْ لَمْ تُنْذِرْهُمْ لَا یُؤْمِنُوْنَ(۱۰)
☆अनुवाद हिन्दि कन्जुल इमान
◆ और उन्हें एक सा है तुम उन्हें डराओ या न डराओ वह ईमान लाने के नहीं।
( YASIN - 36:10 )
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★ اِنَّمَا تُنْذِرُ مَنِ اتَّبَعَ الذِّكْرَ وَ خَشِیَ الرَّحْمٰنَ بِالْغَیْبِۚ-فَبَشِّرْهُ بِمَغْفِرَةٍ وَّ اَجْرٍ كَرِیْمٍ(۱۱)
☆अनुवाद हिन्दि कन्जुल इमान
◆ तुम तो उसी को डर सुनाते हो (फ़9) जो नसीहत पर चले और रहमान से बे-देखे डरे तो उसे बख़्शिश और इज़्ज़त के सवाब की बशारत दो। (फ़10)
( YASIN - 36:11 )
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★ اِنَّا نَحْنُ نُحْیِ الْمَوْتٰى وَ نَكْتُبُ مَا قَدَّمُوْا وَ اٰثَارَهُمْۣؕ-وَ كُلَّ شَیْءٍ اَحْصَیْنٰهُ فِیْۤ اِمَامٍ مُّبِیْنٍ۠(۱۲)
☆अनुवाद हिन्दि कन्जुल इमान
◆ बेशक हम मुर्दों को जिलायेंगे और हम लिख रहे हैं जो उन्होंने आगे भेजा (फ़11) और जो निशानियां पीछे छोड़ गए (फ़12) और हर चीज़ हमने गिन रखी है एक बताने वाली किताब में। (फ़13)
( YASIN - 36:12 )
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★ وَ اضْرِبْ لَهُمْ مَّثَلًا اَصْحٰبَ الْقَرْیَةِۘ-اِذْ جَآءَهَا الْمُرْسَلُوْنَۚ(۱۳)
☆अनुवाद हिन्दि कन्जुल इमान
◆ और उनसे निशानियां बयान करो उस शहर वालों की (फ़14) जब उनके पास फ़िरिस्तादे आये। (फ़15)
( YASIN - 36:13 )
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★ اِذْ اَرْسَلْنَاۤ اِلَیْهِمُ اثْنَیْنِ فَكَذَّبُوْهُمَا فَعَزَّزْنَا بِثَالِثٍ فَقَالُوْۤا اِنَّاۤ اِلَیْكُمْ مُّرْسَلُوْنَ(۱۴)
☆अनुवाद हिन्दि कन्जुल इमान
◆ जब हमने उनकी तरफ़ दो भेजे (फ़16) फिर उन्होंने उनको झुठलाया तो हमने तीसरे से ज़ोर दिया (फ़17) अब उन सब ने कहा (फ़18) कि बेशक हम तुम्हारी तरफ़ भेजे गए हैं।
( YASIN - 36:14 )
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★ قَالُوْا مَاۤ اَنْتُمْ اِلَّا بَشَرٌ مِّثْلُنَاۙ-وَ مَاۤ اَنْزَلَ الرَّحْمٰنُ مِنْ شَیْءٍۙ-اِنْ اَنْتُمْ اِلَّا تَكْذِبُوْنَ(۱۵)
☆अनुवाद हिन्दि कन्जुल इमान
◆ बोले तुम तो नहीं मगर हम जैसे आदमी और रहमान ने कुछ नहीं उतारा तुम निरे झूठे हो।
( YASIN - 36:15 )
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★ قَالُوْا رَبُّنَا یَعْلَمُ اِنَّاۤ اِلَیْكُمْ لَمُرْسَلُوْنَ(۱۶)
☆अनुवाद हिन्दि कन्जुल इमान
◆ वह बोले हमारा रब जानता है कि बेशक ज़रूर हम तुम्हारी तरफ़ भेजे गए हैं।
( YASIN - 36:16 )
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★ وَ مَا عَلَیْنَاۤ اِلَّا الْبَلٰغُ الْمُبِیْنُ(۱۷)
☆अनुवाद हिन्दि कन्जुल इमान
◆ और हमारे ज़िम्मा नहीं मगर साफ़ पहुंचा देना। (फ़19)
( YASIN - 36:17 )
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★ قَالُوْۤا اِنَّا تَطَیَّرْنَا بِكُمْۚ-لَىٕنْ لَّمْ تَنْتَهُوْا لَنَرْجُمَنَّكُمْ وَ لَیَمَسَّنَّكُمْ مِّنَّا عَذَابٌ اَلِیْمٌ(۱۸)
☆अनुवाद हिन्दि कन्जुल इमान
◆ बोले हम तुम्हें मनहूस समझते हैं (फ़20) बेशक तुम अगर बाज़ न आये (फ़21) तो ज़रूर हम तुम्हें संगसार करेंगे और बेशक हमारे हाथों तुम पर दुःख की मार पड़ेगी।
( YASIN - 36:18 )
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★ قَالُوْا طَآىٕرُكُمْ مَّعَكُمْؕ-اَىٕنْ ذُكِّرْتُمْؕ-بَلْ اَنْتُمْ قَوْمٌ مُّسْرِفُوْنَ(۱۹)
☆अनुवाद हिन्दि कन्जुल इमान
◆ उन्होंने फ़रमाया तुम्हारी नुहुसत तो तुम्हारे साथ है (फ़22) क्या इस पर बिदकते हो कि तुम समझाए गए (फ़23) बल्कि तुम हद से बढ़ने वाले लोग हो। (फ़24)
( YASIN - 36:19 )
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★ وَ جَآءَ مِنْ اَقْصَا الْمَدِیْنَةِ رَجُلٌ یَّسْعٰى قَالَ یٰقَوْمِ اتَّبِعُوا الْمُرْسَلِیْنَۙ(۲۰)
☆अनुवाद हिन्दि कन्जुल इमान
◆ और शहर के परले किनारे से एक मर्द दौड़ता आया (फ़25) बोला ऐ मेरी क़ौम भेजे हुओं की पैरवी करो।
( YASIN - 36:20 )
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★ اتَّبِعُوْا مَنْ لَّا یَسْــٴَـلُكُمْ اَجْرًا وَّ هُمْ مُّهْتَدُوْنَ(۲۱)
☆अनुवाद हिन्दि कन्जुल इमान
◆ एसों की पैरवी करो जो तुम से कुछ नेग नहीं मांगते और वह राह पर हैं। (फ़26)
( YASIN - 36:21 )
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★ وَ مَا لِیَ لَاۤ اَعْبُدُ الَّذِیْ فَطَرَنِیْ وَ اِلَیْهِ تُرْجَعُوْنَ(۲۲)
☆अनुवाद हिन्दि कन्जुल इमान
◆ और मुझे क्या है कि उसकी बन्दगी न करूं जिसने मुझे पैदा किया और उसी की तरफ़ तुम्हें पलटना है। (फ़27)
( YASIN - 36:22 )
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★ ءَاَتَّخِذُ مِنْ دُوْنِهٖۤ اٰلِهَةً اِنْ یُّرِدْنِ الرَّحْمٰنُ بِضُرٍّ لَّا تُغْنِ عَنِّیْ شَفَاعَتُهُمْ شَیْــٴًـا وَّ لَا یُنْقِذُوْنِۚ(۲۳)
☆अनुवाद हिन्दि कन्जुल इमान
◆ क्या अल्लाह के सिवा और ख़ुदा ठहराऊँ (फ़28) कि अगर रहमान मेरा कुछ बुरा चाहे तो उनकी सिफ़ारिश मेरे कुछ काम न आये और न वह मुझे बचा सकें।
( YASIN - 36:23 )
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★ اِنِّیْۤ اِذًا لَّفِیْ ضَلٰلٍ مُّبِیْنٍ(۲۴)
☆अनुवाद हिन्दि कन्जुल इमान
◆ बेशक जब तो मैं ख़ुली गुमराही में हूं। (फ़29)
( YASIN - 36:24 )
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★ اِنِّیْۤ اٰمَنْتُ بِرَبِّكُمْ فَاسْمَعُوْنِؕ(۲۵)
☆अनुवाद हिन्दि कन्जुल इमान
◆ मुक़र्रर मैं तुम्हारे रब पर ईमान लाया तो मेरी सुनो। (फ़30)
( YASIN - 36:25 )
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★ قِیْلَ ادْخُلِ الْجَنَّةَؕ-قَالَ یٰلَیْتَ قَوْمِیْ یَعْلَمُوْنَۙ(۲۶)
☆अनुवाद हिन्दि कन्जुल इमान
◆ उससे फ़रमाया गया कि जन्नत में दाख़िल हो (फ़31) कहा किसी तरह मेरी क़ौम जानती।
( YASIN - 36:26 )
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★ بِمَا غَفَرَ لِیْ رَبِّیْ وَ جَعَلَنِیْ مِنَ الْمُكْرَمِیْنَ(۲۷)
☆अनुवाद हिन्दि कन्जुल इमान
◆ जैसी मेरे रब ने मेरी मग़फ़िरत की और मुझे इज़्ज़त वालों में किया। (फ़32)
( YASIN - 36:27 )
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★ وَ مَاۤ اَنْزَلْنَا عَلٰى قَوْمِهٖ مِنْۢ بَعْدِهٖ مِنْ جُنْدٍ مِّنَ السَّمَآءِ وَ مَا كُنَّا مُنْزِلِیْنَ(۲۸)
☆अनुवाद हिन्दि कन्जुल इमान
◆ और हमने उसके बाद उसकी क़ौम पर आसमान से कोई लश्कर न उतारा (फ़33) और न हमें वहां कोई लश्कर उतारना था।
( YASIN - 36:28 )
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★ اِنْ كَانَتْ اِلَّا صَیْحَةً وَّاحِدَةً فَاِذَا هُمْ خٰمِدُوْنَ(۲۹)
☆अनुवाद हिन्दि कन्जुल इमान
◆ वह तो बस एक ही चीख़ थी जभी वह बुझ कर रह गए। (फ़34)
( YASIN - 36:29 )
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★ یٰحَسْرَةً عَلَى الْعِبَادِۣۚ-مَا یَاْتِیْهِمْ مِّنْ رَّسُوْلٍ اِلَّا كَانُوْا بِهٖ یَسْتَهْزِءُوْنَ(۳۰)
☆अनुवाद हिन्दि कन्जुल इमान
◆ और कहा गया कि हाये अफ़सोस उन बन्दों पर (फ़35) जब उनके पास कोई रसूल आता है तो उससे ठट्ठा ही करते हैं।
( YASIN - 36:30 )
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★ اَلَمْ یَرَوْا كَمْ اَهْلَكْنَا قَبْلَهُمْ مِّنَ الْقُرُوْنِ اَنَّهُمْ اِلَیْهِمْ لَا یَرْجِعُوْنَؕ(۳۱)
☆अनुवाद हिन्दि कन्जुल इमान
☆ Kanzul Iman Translation:
◆ क्या उन्होंने न देखा (फ़36) हमने उनसे पहले कितनी संगतें हलाक फ़रमाईं कि वह अब उनकी तरफ़ पलटने वाले नहीं। (फ़37)
( YASIN - 36:31 )
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★ وَ اِنْ كُلٌّ لَّمَّا جَمِیْعٌ لَّدَیْنَا مُحْضَرُوْنَ۠(۳۲)
☆अनुवाद हिन्दि कन्जुल इमान
◆ और जितने भी हैं सबके सब हमारे हुज़ूर हाज़िर लाये जायेंगे। (फ़38)
( YASIN - 36:32 )
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★ وَ اٰیَةٌ لَّهُمُ الْاَرْضُ الْمَیْتَةُ ۚۖ-اَحْیَیْنٰهَا وَ اَخْرَجْنَا مِنْهَا حَبًّا فَمِنْهُ یَاْكُلُوْنَ(۳۳)
☆अनुवाद हिन्दि कन्जुल इमान
◆ और उनके लिये एक निशानी मुर्दा ज़मीन है (फ़39) हमने उसे ज़िन्दा किया (फ़40) और फिर उससे अनाज निकाला तो उसमें से खाते हैं।
( YASIN - 36:33 )
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★ وَ جَعَلْنَا فِیْهَا جَنّٰتٍ مِّنْ نَّخِیْلٍ وَّ اَعْنَابٍ وَّ فَجَّرْنَا فِیْهَا مِنَ الْعُیُوْنِۙ(۳۴)
☆अनुवाद हिन्दि कन्जुल इमान
◆ और हमने उसमें (फ़41) बाग़ बनाए खजूरों और अंगूरों के और हमने उसमें कुछ चश्मे बहाए।
( YASIN - 36:34 )
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★ لِیَاْكُلُوْا مِنْ ثَمَرِهٖۙ-وَ مَا عَمِلَتْهُ اَیْدِیْهِمْؕ-اَفَلَا یَشْكُرُوْنَ(۳۵)
☆अनुवाद हिन्दि कन्जुल इमान
◆ कि उसके फलों में से खायें और यह उनके हाथ के बनाए नहीं तो क्या हक़ न मानेंगे। (फ़42)
( YASIN - 36:35 )
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★ سُبْحٰنَ الَّذِیْ خَلَقَ الْاَزْوَاجَ كُلَّهَا مِمَّا تُنْۢبِتُ الْاَرْضُ وَ مِنْ اَنْفُسِهِمْ وَ مِمَّا لَا یَعْلَمُوْنَ(۳۶)
☆अनुवाद हिन्दि कन्जुल इमान
◆ पाकी है उसे जिसने सब जोड़े बनाए (फ़43) उन चीज़ों से जिन्हें ज़मीन उगाती है (फ़44) और ख़ुद उनसे (फ़45) और उन चीज़ों से जिन की उन्हें ख़बर नहीं। (फ़46)
( YASIN - 36:36 )
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★ وَ اٰیَةٌ لَّهُمُ الَّیْلُ ۚۖ-نَسْلَخُ مِنْهُ النَّهَارَ فَاِذَا هُمْ مُّظْلِمُوْنَۙ(۳۷)
☆अनुवाद हिन्दि कन्जुल इमान
◆ और उनके लिये एक निशानी (फ़47) रात है हम उस पर से दिन खींचे लेते हैं (फ़48) जभी वह अंधेरे में हैं।
( YASIN - 36:37 )
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★ وَ الشَّمْسُ تَجْرِیْ لِمُسْتَقَرٍّ لَّهَاؕ-ذٰلِكَ تَقْدِیْرُ الْعَزِیْزِ الْعَلِیْمِؕ(۳۸)
☆अनुवाद हिन्दि कन्जुल इमान
◆ और सूरज चलता है अपने एक ठहराव के लिये (फ़49) यह हुक्म है ज़बरदस्त इल्म वाले का। (फ़50)
( YASIN - 36:38 )
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★ وَ الْقَمَرَ قَدَّرْنٰهُ مَنَازِلَ حَتّٰى عَادَ كَالْعُرْجُوْنِ الْقَدِیْمِ(۳۹)
☆अनुवाद हिन्दि कन्जुल इमान
◆ और चाँद के लिये हमने मंज़िलें मुक़र्रर कीं (फ़51) यहाँ तक कि फिर हो गया जैसी खजूर की पुरानी डाल। (फ़52)
( YASIN - 36:39 )
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★ لَا الشَّمْسُ یَنْۢبَغِیْ لَهَاۤ اَنْ تُدْرِكَ الْقَمَرَ وَ لَا الَّیْلُ سَابِقُ النَّهَارِؕ-وَ كُلٌّ فِیْ فَلَكٍ یَّسْبَحُوْنَ(۴۰)
☆अनुवाद हिन्दि कन्जुल इमान
◆ सूरज को नहीं पहुंचता कि चाँद को पकड़ ले (फ़53) और न रात दिन पर सबक़त ले जाये (फ़54) और हर एक एक घेरे में पैर रहा है।
( YASIN - 36:40 )
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★ وَ اٰیَةٌ لَّهُمْ اَنَّا حَمَلْنَا ذُرِّیَّتَهُمْ فِی الْفُلْكِ الْمَشْحُوْنِۙ(۴۱)
☆अनुवाद हिन्दि कन्जुल इमान
◆ और उनके लिये एक निशानी यह है कि उन्हें उनके बुज़ुर्गों की पीठ में हमने भरी कश्ती में सवार किया। (फ़55)
( YASIN - 36:41 )
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★ وَ خَلَقْنَا لَهُمْ مِّنْ مِّثْلِهٖ مَا یَرْكَبُوْنَ(۴۲)
☆अनुवाद हिन्दि कन्जुल इमान
◆ और उनके लिये वैसी ही कश्तियाँ बना दीं जिन पर सवार होते हैं।
( YASIN - 36:42 )
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★ وَ اِنْ نَّشَاْ نُغْرِقْهُمْ فَلَا صَرِیْخَ لَهُمْ وَ لَا هُمْ یُنْقَذُوْنَۙ(۴۳)
☆अनुवाद हिन्दि कन्जुल इमान
◆ और हम चाहें तो उन्हें डूबो दें (फ़56) तो न कोई उनकी फ़रियाद को पहुंचने वाला हो और न वह बचाए जायें।
( YASIN - 36:43 )
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★ اِلَّا رَحْمَةً مِّنَّا وَ مَتَاعًا اِلٰى حِیْنٍ(۴۴)
☆अनुवाद हिन्दि कन्जुल इमान
◆ मगर हमारी तरफ़ की रहमत और एक वक़्त तक बरतने देना। (फ़57)
( YASIN - 36:44 )
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★ وَ اِذَا قِیْلَ لَهُمُ اتَّقُوْا مَا بَیْنَ اَیْدِیْكُمْ وَ مَا خَلْفَكُمْ لَعَلَّكُمْ تُرْحَمُوْنَ(۴۵)
☆अनुवाद हिन्दि कन्जुल इमान
◆ और जब उनसे फ़रमाया जाता है डरो तुम उससे जो तुम्हारे सामने है (फ़58) और जो तुम्हारे पीछे आने वाला है (फ़59) इस उम्मीद पर कि तुम पर मेहर हो तो मुंह फेर लेते हैं।
( YASIN - 36:45 )
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★ وَ مَا تَاْتِیْهِمْ مِّنْ اٰیَةٍ مِّنْ اٰیٰتِ رَبِّهِمْ اِلَّا كَانُوْا عَنْهَا مُعْرِضِیْنَ(۴۶)
☆अनुवाद हिन्दि कन्जुल इमान
◆ और जब कभी उनके रब की निशानियों से कोई निशानी उनके पास आती है तो उससे मुंह ही फेर लेते हैं। (फ़60)
( YASIN - 36:46 )
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★ وَ اِذَا قِیْلَ لَهُمْ اَنْفِقُوْا مِمَّا رَزَقَكُمُ اللّٰهُۙ-قَالَ الَّذِیْنَ كَفَرُوْا لِلَّذِیْنَ اٰمَنُوْۤا اَنُطْعِمُ مَنْ لَّوْ یَشَآءُ اللّٰهُ اَطْعَمَهٗۤ ﳓ اِنْ اَنْتُمْ اِلَّا فِیْ ضَلٰلٍ مُّبِیْنٍ(۴۷)
☆अनुवाद हिन्दि कन्जुल इमान
◆ और जब उनसे फ़रमाया जाये अल्लाह के दिये में से कुछ उसकी राह में ख़र्च करो तो काफ़िर मुसलमानों के लिये कहते हैं कि क्या हम उसे खिलायें जिसे अल्लाह चाहता तो खिला देता (फ़61) तुम तो नहीं मगर ख़ुली गुमराही में।
( YASIN - 36:47 )
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★ وَ یَقُوْلُوْنَ مَتٰى هٰذَا الْوَعْدُ اِنْ كُنْتُمْ صٰدِقِیْنَ(۴۸)
☆अनुवाद हिन्दि कन्जुल इमान
◆ और कहते हैं कब आयेगा यह वादा (फ़62) अगर तुम सच्चे हो। (फ़63)
( YASIN - 36:48 )
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★ مَا یَنْظُرُوْنَ اِلَّا صَیْحَةً وَّاحِدَةً تَاْخُذُهُمْ وَ هُمْ یَخِصِّمُوْنَ(۴۹)
☆अनुवाद हिन्दि कन्जुल इमान
◆ राह नहीं देखते मगर एक चीख़ की (फ़64) कि उन्हें आ लेगी जब वह दुनिया के झगड़े में फंसे होंगे। (फ़65)
( YASIN - 36:49 )
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★ فَلَا یَسْتَطِیْعُوْنَ تَوْصِیَةً وَّ لَاۤ اِلٰۤى اَهْلِهِمْ یَرْجِعُوْنَ۠(۵۰)
☆अनुवाद हिन्दि कन्जुल इमान
◆ तो न वसीयत कर सकेंगे और न अपने घर पलट कर जायें। (फ़66)
( YASIN - 36:50 )
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★ وَ نُفِخَ فِی الصُّوْرِ فَاِذَا هُمْ مِّنَ الْاَجْدَاثِ اِلٰى رَبِّهِمْ یَنْسِلُوْنَ(۵۱)
☆अनुवाद हिन्दि कन्जुल इमान
◆ और फूंका जायेगा सूर (फ़67) जभी वह क़ब्रों से (फ़68) अपने रब की तरफ़ दौड़ते चलेंगे।
( YASIN - 36:51 )
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★ قَالُوْا یٰوَیْلَنَا مَنْۢ بَعَثَنَا مِنْ مَّرْقَدِنَاﱃ هٰذَا مَا وَعَدَ الرَّحْمٰنُ وَ صَدَقَ الْمُرْسَلُوْنَ(۵۲) <small><font color="#ff0061">ⓘ</font></small>
☆अनुवाद हिन्दि कन्जुल इमान
◆ कहेंगे हाये हमारी ख़राबी किस ने हमें सोते से जगा दिया (फ़69) यह है वह जिसका रहमान ने वादा दिया था और रसूलों ने हक़ फ़रमाया। (फ़70)
( YASIN - 36:52 )
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★ اِنْ كَانَتْ اِلَّا صَیْحَةً وَّاحِدَةً فَاِذَا هُمْ جَمِیْعٌ لَّدَیْنَا مُحْضَرُوْنَ(۵۳)
☆अनुवाद हिन्दि कन्जुल इमान
◆ वह तो न होगी मगर एक चिंघाड़ (फ़71) जभी वह सबके सब हमारे हुज़ूर हाज़िर हो जायेंगे। (फ़72)
( YASIN - 36:53 )
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★ فَالْیَوْمَ لَا تُظْلَمُ نَفْسٌ شَیْــٴًـا وَّ لَا تُجْزَوْنَ اِلَّا مَا كُنْتُمْ تَعْمَلُوْنَ(۵۴)
☆अनुवाद हिन्दि कन्जुल इमान
◆ तो आज किसी जान पर कुछ ज़ुल्म न होगा और तुम्हें बदला न मिलेगा मगर अपने किये का।
( YASIN - 36:54 )
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★ اِنَّ اَصْحٰبَ الْجَنَّةِ الْیَوْمَ فِیْ شُغُلٍ فٰكِهُوْنَۚ(۵۵)
☆अनुवाद हिन्दि कन्जुल इमान
◆ बेशक जन्नत वाले आज दिल के बहलावों में चैन करते हैं। (फ़73)
( YASIN - 36:55 )
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★ هُمْ وَ اَزْوَاجُهُمْ فِیْ ظِلٰلٍ عَلَى الْاَرَآىٕكِ مُتَّكِــٴُـوْنَ (۵۶)
☆अनुवाद हिन्दि कन्जुल इमान
◆ वह और उनकी बीबियां सायों में हैं तख़्तों पर तकिया लगाए।
( YASIN - 36:56 )
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★ لَهُمْ فِیْهَا فَاكِهَةٌ وَّ لَهُمْ مَّا یَدَّعُوْنَۚۖ(۵۷)
☆अनुवाद हिन्दि कन्जुल इमान
◆ उनके लिये उसमें मेवा है और उनके लिये है उसमें जो मांगें।
( YASIN - 36:57 )
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★ سَلٰمٌ- قَوْلًا مِّنْ رَّبٍّ رَّحِیْمٍ(۵۸)
☆ Kanzul Iman ☆ Kanzul Iman Translation:
:
◆ उन पर सलाम होगा मेहरबान रब का फ़रमाया हुआ। (फ़74)
( YASIN - 36:58 )
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★ وَ امْتَازُوا الْیَوْمَ اَیُّهَا الْمُجْرِمُوْنَ(۵۹)
☆अनुवाद हिन्दि कन्जुल इमान
◆ और आज अलग फट जाओ ऐ मुजरिमो। (फ़75)
( YASIN - 36:59 )
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★ اَلَمْ اَعْهَدْ اِلَیْكُمْ یٰبَنِیْۤ اٰدَمَ اَنْ لَّا تَعْبُدُوا الشَّیْطٰنَۚ-اِنَّهٗ لَكُمْ عَدُوٌّ مُّبِیْنٌۙ(۶۰)
☆अनुवाद हिन्दि कन्जुल इमान
◆ ऐ औलादे आदम क्या मैंने तुम से अहद न लिया था (फ़76) कि शैतान को न पूजना (फ़77) बेशक वह तुम्हारा खूला दुश्मन है।
( YASIN - 36:60 )
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★ وَّ اَنِ اعْبُدُوْنِیْﳳ-هٰذَا صِرَاطٌ مُّسْتَقِیْمٌ(۶۱)
☆अनुवाद हिन्दि कन्जुल इमान
◆ और मेरी बन्दगी करना (फ़78) यह सीधी राह है।
( YASIN - 36:61 )
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★ وَ لَقَدْ اَضَلَّ مِنْكُمْ جِبِلًّا كَثِیْرًاؕ-اَفَلَمْ تَكُوْنُوْا تَعْقِلُوْنَ(۶۲)
☆अनुवाद हिन्दि कन्जुल इमान
◆ और बेशक उसने तुम में से बहुत सी ख़िलक़त को बहका दिया तो क्या तुम्हें अक़्ल न थी। (फ़79)
( YASIN - 36:62 )
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★ هٰذِهٖ جَهَنَّمُ الَّتِیْ كُنْتُمْ تُوْعَدُوْنَ(۶۳)
☆अनुवाद हिन्दि कन्जुल इमान
◆ यह है वह जहन्नम जिसका तुम से वादा था।
( YASIN - 36:63 )
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★ اِصْلَوْهَا الْیَوْمَ بِمَا كُنْتُمْ تَكْفُرُوْنَ(۶۴)
☆अनुवाद हिन्दि कन्जुल इमान
◆ आज इसी में जाओ बदला अपने कुफ़्र का।
( YASIN - 36:64 )
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★ اَلْیَوْمَ نَخْتِمُ عَلٰۤى اَفْوَاهِهِمْ وَ تُكَلِّمُنَاۤ اَیْدِیْهِمْ وَ تَشْهَدُ اَرْجُلُهُمْ بِمَا كَانُوْا یَكْسِبُوْنَ(۶۵)
☆अनुवाद हिन्दि कन्जुल इमान
◆ आज हम उनके मुहों पर मुहर कर देंगे (फ़80) और उनके हाथ हम से बात करेंगे और उनके पाँव उनके किये की गवाही देंगे। (फ़81)
( YASIN - 36:65 )
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★ وَ لَوْ نَشَآءُ لَطَمَسْنَا عَلٰۤى اَعْیُنِهِمْ فَاسْتَبَقُوا الصِّرَاطَ فَاَنّٰى یُبْصِرُوْنَ(۶۶)
☆अनुवाद हिन्दि कन्जुल इमान
◆ और अगर हम चाहते तो उनकी आँख़ें मिटा देते (फ़82) फिर लपक कर रास्ते की तरफ़ जाते तो उन्हें कुछ न सूझता। (फ़83)
( YASIN - 36:66 )
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★ وَ لَوْ نَشَآءُ لَمَسَخْنٰهُمْ عَلٰى مَكَانَتِهِمْ فَمَا اسْتَطَاعُوْا مُضِیًّا وَّ لَا یَرْجِعُوْنَ۠(۶۷)
☆अनुवाद हिन्दि कन्जुल इमान
◆ और अगर हम चाहते तो उनके घर बैठे उनकी सूरतें बदल देते (फ़84) कि न आगे बढ़ सकते न पीछे लौटते। (फ़85)
( YASIN - 36:67 )
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★ وَ مَنْ نُّعَمِّرْهُ نُنَكِّسْهُ فِی الْخَلْقِؕ-اَفَلَا یَعْقِلُوْنَ(۶۸)
☆अनुवाद हिन्दि कन्जुल इमान
◆ और जिसे हम बड़ी उम्र का करें उसे पैदाइश में उलटा फेरें (फ़86) तो क्या समझते नहीं। (फ़87)
( YASIN - 36:68 )
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★ وَ مَا عَلَّمْنٰهُ الشِّعْرَ وَ مَا یَنْۢبَغِیْ لَهٗؕ-اِنْ هُوَ اِلَّا ذِكْرٌ وَّ قُرْاٰنٌ مُّبِیْنٌۙ(۶۹)
☆अनुवाद हिन्दि कन्जुल इमान
◆ और हमने उनको शेअर कहना न सिखाया (फ़88) और न वह उनकी शान के लाइक़ है वह तो नहीं मगर नसीहत और रौशन क़ुरआन। (फ़89)
( YASIN - 36:69 )
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★ لِّیُنْذِرَ مَنْ كَانَ حَیًّا وَّ یَحِقَّ الْقَوْلُ عَلَى الْكٰفِرِیْنَ(۷۰)
☆अनुवाद हिन्दि कन्जुल इमान
◆ कि उसे डराए जो ज़िन्दा हो (फ़90) और काफ़िरों पर बात साबित हो जाये। (फ़91)
( YASIN - 36:70 )
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★ اَوَ لَمْ یَرَوْا اَنَّا خَلَقْنَا لَهُمْ مِّمَّا عَمِلَتْ اَیْدِیْنَاۤ اَنْعَامًا فَهُمْ لَهَا مٰلِكُوْنَ(۷۱)
☆अनुवाद हिन्दि कन्जुल इमान
◆ और क्या उन्होंने न देखा कि हमने अपने हाथ के बनाए हुए चौपाए उनके लिये पैदा किये तो यह उनके मालिक हैं।
( YASIN - 36:71 )
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★ وَ ذَلَّلْنٰهَا لَهُمْ فَمِنْهَا رَكُوْبُهُمْ وَ مِنْهَا یَاْكُلُوْنَ(۷۲)
☆अनुवाद हिन्दि कन्जुल इमान
◆ और उन्हें उनके लिये नर्म कर दिया (फ़92) तो किसी पर सवार होते और किसी को खाते हैं।
( YASIN - 36:72 )
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★ وَ لَهُمْ فِیْهَا مَنَافِعُ وَ مَشَارِبُؕ-اَفَلَا یَشْكُرُوْنَ(۷۳)
☆अनुवाद हिन्दि कन्जुल इमान
◆ और उनके लिये उनमें कई तरह के नफ़े (फ़93) और पीने की चीज़ें हैं (फ़94) तो क्या शुक्र न करेंगे। (फ़95)
( YASIN - 36:73 )
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★ وَ اتَّخَذُوْا مِنْ دُوْنِ اللّٰهِ اٰلِهَةً لَّعَلَّهُمْ یُنْصَرُوْنَؕ(۷۴)
☆अनुवाद हिन्दि कन्जुल इमान
◆ और उन्होंने अल्लाह के सिवा और ख़ुदा ठहरा लिये (फ़96) कि शायद उनकी मदद हो। (फ़97)
( YASIN - 36:74 )
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★ لَا یَسْتَطِیْعُوْنَ نَصْرَهُمْۙ-وَ هُمْ لَهُمْ جُنْدٌ مُّحْضَرُوْنَ(۷۵)
☆ Kanzul Iman Translation:
◆ वह उनकी मदद नहीं कर सकते (फ़98) और वह उनके लश्कर सब गिरिफ़्तार हाज़िर आयेंगे। (फ़99)
( YASIN - 36:75 )
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★ فَلَا یَحْزُنْكَ قَوْلُهُمْۘ-اِنَّا نَعْلَمُ مَا یُسِرُّوْنَ وَ مَا یُعْلِنُوْنَ(۷۶)
☆ Kanzul Iman Translation:
◆ तो तुम उनकी बात का ग़म न करो (फ़100) बेशक हम जानते हैं जो वह छुपाते हैं और ज़ाहिर करते हैं। (फ़101)
( YASIN - 36:76 )
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★ اَوَ لَمْ یَرَ الْاِنْسَانُ اَنَّا خَلَقْنٰهُ مِنْ نُّطْفَةٍ فَاِذَا هُوَ خَصِیْمٌ مُّبِیْنٌ(۷۷)
☆अनुवाद हिन्दि कन्जुल इमान
◆ और क्या आदमी ने न देखा कि हमने उसे पानी की बूंद से बनाया जभी वह सरीह झगड़ालू है। (फ़102)
( YASIN - 36:77 )
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★ وَ ضَرَبَ لَنَا مَثَلًا وَّ نَسِیَ خَلْقَهٗؕ-قَالَ مَنْ یُّحْیِ الْعِظَامَ وَ هِیَ رَمِیْمٌ(۷۸)
☆अनुवाद हिन्दि कन्जुल इमान
◆ और हमारे लिये कहावत कहता है (फ़103) और अपनी पैदाइश भूल गया (फ़104) बोला ऐसा कौन है कि हड्डियों को ज़िन्दा करे जब वह बिलकुल गल गईं।
( YASIN - 36:78 )
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★ قُلْ یُحْیِیْهَا الَّذِیْۤ اَنْشَاَهَاۤ اَوَّلَ مَرَّةٍؕ-وَ هُوَ بِكُلِّ خَلْقٍ عَلِیْمُۙﰳ(۷۹)
☆अनुवाद हिन्दि कन्जुल इमान
◆ तुम फ़रमाओ उन्हें वह ज़िन्दा करेगा जिसने पहली बार उन्हें बनाया और उसे हर पैदाइश का इल्म है। (फ़105)
( YASIN - 36:79 )
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★ الَّذِیْ جَعَلَ لَكُمْ مِّنَ الشَّجَرِ الْاَخْضَرِ نَارًا فَاِذَاۤ اَنْتُمْ مِّنْهُ تُوْقِدُوْنَ(۸۰)
☆अनुवाद हिन्दि कन्जुल इमान
◆ जिसने तुम्हारे लिये हरे पेड़ में से आग पैदा की जभी तुम उससे सुलगाते हो। (फ़106)
( YASIN - 36:80 )
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★ اَوَ لَیْسَ الَّذِیْ خَلَقَ السَّمٰوٰتِ وَ الْاَرْضَ بِقٰدِرٍ عَلٰۤى اَنْ یَّخْلُقَ مِثْلَهُمْﳳ-بَلٰىۗ-وَ هُوَ الْخَلّٰقُ الْعَلِیْمُ(۸۱)
☆अनुवाद हिन्दि कन्जुल इमान
◆ और क्या वह जिसने आसमान और ज़मीन बनाए उन जैसे और नहीं बना सकता (फ़107) क्यों नहीं (फ़108) और वही है बड़ा पैदा करने वाला सब कुछ जानता।
( YASIN - 36:81 )
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★ اِنَّمَاۤ اَمْرُهٗۤ اِذَاۤ اَرَادَ شَیْــٴًـا اَنْ یَّقُوْلَ لَهٗ كُنْ فَیَكُوْنُ(۸۲)
☆अनुवाद हिन्दि कन्जुल इमान
◆ उसका काम तो यही है कि जब किसी चीज़ को चाहे (फ़109) तो उससे फ़रमाए हो जा वह फ़ौरन हो जाती है। (फ़110)
( YASIN - 36:82 )
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★ فَسُبْحٰنَ الَّذِیْ بِیَدِهٖ مَلَكُوْتُ كُلِّ شَیْءٍ وَّ اِلَیْهِ تُرْجَعُوْنَ۠(۸۳)
☆अनुवाद हिन्दि कन्जुल इमान
◆ तो पाकी है उसे जिसके हाथ हर चीज़ का क़ब्ज़ा है और उसी की तरफ़ फेरे जाओगे। (फ़111)
( YASIN - 36:83 )
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१-हजरत अनस رضي الله عنه बाट वर्णन गरियको छ "रसुलअल्लाह صلی اللہ علیہ و سلم को मधुर कथन रहेको छ हरेक चिजको एउटा मुटु हुन्छ यासिन कुर-आनको मुटु हो यसलाई पढनेले दस चोटी कुर-आन पढे बराबर सवाब लेखिने छ "
(तिर्मिधि २-११२ मिस्कत् १८७)
२-रसुलअल्लाह صلی اللہ علیہ و سلم को मधुर कथन रहेको छ हरेक चिजको एउटा मुटु हुन्छ यासिन कुर-आनको मुटु हो अल्लाह पाकको खुसी अनि आखिरतको सुधारका निम्ति जसले सुरह यासिन पढने गर्छ उसलाई क्षमा(मग्फिरत) गरिने छ तसर्थ आफ्ना मुर्दाको नजिक यसलाई पढने गर अर्थात् मुर्दा भन्नाले ति वेक्ती जो मृत्युको नजिक रहेका छन्
(तरगिब २-६३६)
३-हजरत अलि رضي الله عنه बाट वर्णन गरियको छ रसुलअल्लाह صلی اللہ علیہ و سلم भन्नु भयो सुरह यासिन पढने गर यसमा कुनै शंका छैन कि यसमा दस १० आशिष् रहेका छन्
१-भोकाले पढे भोक मेटिने छ
२-प्यासाले पढे प्यास मेटिने छ
३-कुनै नाङ्गोले पढे उसले कपडा पाउने छ
४-बिवाह नभयकोले पढे बिवाह ( निकाह) हुने छ
५-कोइ डराएकोले पढे निडर हुने छ
६-कुनै कैदीले पढे रिहा हुने छ
७-कुनै यात्रीले पढे सहयोग हुने छ
८-कुनै ऋणीले पढे ऋण मुक्त हुने छ
९-कसैको कुनै वस्तु हरायको भए पाउने छ
१०-मृत्यु नजिक हुनेका अगाडी पढे रूह(आत्मा) निस्कने बेला सजिलो हुने छ
४-रसुलअल्लाह صلی اللہ علیہ و سلمले भन्नु भयो जसले हरेक रात सुरह यासिन पढछ जब उ मर्ने छ उ शहिद भै मर्ने छ
(दुर्रे मन्सुर ५-२५७)
५-रसुलअल्लाह صلی اللہ علیہ و سلمको मधुर कथन रहेको छ "जसले दिनको शुरुवात भागमा सुरह यासिन पढछ उसका बैध इक्ष्या पूर्ण हुने छन
(मिस्कात १८९)

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