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सुन्नते रसूल ﷺ और इस्लामी तारीख में कोरोना वायरस जैसी खतरनाक वबा की कोई मिसाल (इस हवाले से कि ये महज़ छूने से भी फैलती है) नहीं मिलती लेकिन कुछ ऐसे ही मौक़ों से ताल्लुक़ रखने वाले वाक़िआत पर गौरो फिक्र करने से चीज़ें वाज़ेह हो जाती हैं- अल्लाह के रसूल ﷺ ने बरसात की रातों में..सर्दी में और ख़ौफ के आलम में नमाज़ों को अपने घरों से अदा करने की तल्क़ीन फरमाई.. यहां तक कि नमाज़े जुमा भी- बुखारी और मुस्लिम में बहुत सारी रिवायतें इस हवाले से मिलती हैं-
अब्दुल्लाह बिन उमर رضی اللہ عنہ ने एक सर्द रात में मक़ामे ज़जनान पर अज़ान दी फिर फ़रमाया:
                       ”الا صلوٰۃ فی الرحال”
            "कि लोगो ! अपने अपने ठिकानों में नमाज़ पढ़ लो और हमें आपने बतलाया कि नबी ए करीम ﷺ मुअज़्ज़िन से अज़ान के लिए फरमाते और ये भी फरमाते कि मुअज़्ज़िन अज़ान के बाद कह दे कि लोगो ! अपने ठिकानों में नमाज़ पढ़ लो- ये हुक्म सफर की हालत में या सर्दी या बरसात की रातों में था-"
(Bukhari 632)

हमें एक दिन हज़रते इब्ने अब्बास رضی اللہ تعالیٰ عنہ ने जब कि बारिश की वजह से कीचड़ हो रही थी खुत्बा सुनाया- फिर मुअज़्ज़िन को हुक्म दिया और जब वो “حى على الصلاة ” पर पहुंचा तो आपने फ़रमाया कि:
              "आज यूं पुकार दो”الصلاة في الرحال “ कि नमाज़ अपनी क़ियामगाहों पर पढ़ लो-"
लोग एक दूसरे को हैरत की वजह से देखने लगे- जिसे उसको उन्होंने नाजायज़ समझा- इब्ने अब्बास رضی اللہ تعالیٰ عنہ ने फ़रमाया कि:
               "ऐसा मालूम होता है कि तुमने शायद इसको बुरा जाना है- ऐसा तो मुझसे बेहतर ज़ात यानी रसूलुल्लाह ﷺ ने भी किया था - बेशक जुमा वाजिब है मगर मैंने ये पसंद नहीं किया कि ”حى على الصلاة ” कहकर तुम्हे बाहर निकालूं और तकलीफ़ में मुब्तिला करूं-"
और हम्माद आसिम से वो अब्दुल्लाह बिन हारिस से वो इब्ने अब्बास رضی اللہ عنہما से इसी तरह रिवायत करते हैं- अलबत्ता उन्होंने इतना और कहा कि इब्ने अब्बास رضی اللہ تعالیٰ عنہ ने फ़रमाया कि:
             "मुझे अच्छा मालूम नहीं हुआ कि तुम्हे गुनाहगार करूं और तुम इस हालत में आओ कि तुम मिट्टी में घुटनों तक आलूदा हो-" (Bukhari 668)
इस्लामी तारीख में ताऊन की बीमारी का वाक़िआ क़ाबिले ज़िक्र है- जो 18 हिजरी में पेश आया जिस वक़्त मुस्लिम अफ्वाज शाम में रूमियों के खिलाफ जंग कर रही थी उस वक़्त वहां ताऊन की वबा फिल्म ली जिसकी वजह से 25 हज़ार मौतें हुईं- जिसमें हज़रते मआज़ बिन जबल..हज़रते अबू उबैदा बिन जर्राह..हज़रत यज़ीद बिन अबू सुफियान और दीगर सहाबा ए किराम भी शहीद हुए- उस वक़्त हज़रत अम्र बिन आस ने फौज की कमान संभाली और लोगों को वादियों में मुन्तशिर (बिखर जाना) होने का हुक्म दिया और एक जगह जमा होने से गुरेज़ करने की तल्क़ीन फरमाई- उन्होंने ताऊन (प्लेग) को आग से तश्बीह दी और कहा कि:
         "ताऊन लोगों पर असरअंदाज़ नहीं होगा अगर वो दूर दूर रहें-"
जब इसकी इत्तिला हज़रत उमर رضی اللہ تعالیٰ عنہ को हुई तो उन्होंने इस पॉलिसी को मुनासिब समझा- इसी ताऊन के दौरान हज़रत उमर ने हज़रत अबू उबैदा बिन जर्राह के इसरार के बावजूद भी दमिश्क़ को जाने का इरादा तर्क कर दिया और इस अम्र को समझाने के लिए एक बहुत खूबसूरत तश्बीह भी दी थी-

वाक़िआ इब्ने हजर अस्क़लानी की किताब " بذل الماعون في فضل الطاعون" में मिलता है जिसमें वो क़ाहिरा में 833 हिजरी में ताऊन की वबा का ज़िक्र करते हैं.. जब रोज़ाना औसतन 40 लोग इस वबा की वजह से लुक़्मा ए अजल बन रहे थे- चुनांचा शहर के बुज़ुर्गों ने फैसला किया कि शहर के बाहर जाकर सहरा में इज्तिमाई दुआ की जाए- वहां उन्होंने कई हफ्ते गुज़ार कर इज्तिमाई दुआ और इबादात का एहतिमाम किया- लेकिन वापस शहर पहुंचने के बाद मरने वालों की तादाद में अचानक कई गुना इज़ाफा हो गया और रोज़ाना मरने वालों की तादाद बढ़कर हज़ारों तक पहुंच गई- यानी इस मुआमले में इज्तिमाई शक्ल में जमा होना दरअस्ल मज़ीद हलाकत का सबब बना- इस क़िस्म का एक और वाक़िआ साल 794 में दमिश्क़ में भी पेश आया-
इन सारी रिवायात और वाक़िआत की रौशनी में हमारे लिए मन्दर्जा जैल सबक़ क़ाबिले गौर हैं....
अव्वल तो ये कि:
                "जब ऐसी नागहानी सूरतेहाल पेश आए जैसे ताऊन या वबा या शदीद बरसात..तो ऐसी हालत में इंसानी जान का तहफ्फुज़  सबसे बड़ी अहमियत का हामिल बन जाता है- कोशिश इस बात की होनी चाहिए कि इंसानी जान के नुक़सान से बचा जा सके-"
चुनांचा अल्लाह के रसूल ﷺ ने एक मोमिन की जान की हुरमत को काबातुल्लाह की हुरमत से भी ज़्यादा क़रार दिया है- अल्लाह के रसूल के अमल से इस बात की वज़ाहत मिलती है कि.. बारिश और शदीद ठंड जो कि आरज़ी वाक़िआत हैं.. और जिनमें जानों के नुक़सान का कोई इम्कान नहीं बल्कि कुछ मशक़्क़त और मुश्किलात दरपेश आती हैं उनमें भी अल्लाह के रसूल ने नमाज़े जुमा को घरों पर अदा करने की तल्क़ीन फरमाई- अब तसव्वुर कीजिए कि जहां मस्जिद में लोगों के जमा हो जाने से इस बात को पूरा अंदेशा हो कि वबा पूरे मुआशरे में फैल सकती है तो नमाज़ों का घर पर एहतिमाम करना ऐन सुन्नते रसूल के मुताबिक़ है-
दूसरी बात ये कि:
               "ताऊन के हालात में सहाबा ने इज्तिहाद किया और वो तदाबीर इख्तियार कीं जो उस मक़ाम और हालात के लिहाज़ से मौज़ूं समझी गईं- ऐसी ही मिसालें सीरते रसूल से भी मिलती हैं..जब अल्लाह के रसूल ने जंगे उहुद के दौरान 2 ज़िरह पहनने का एहतिमाम किया और जंगे अहज़ाब के मौक़े पर हज़रत सुलेमान फारसी के मशवरे पर खंदक खोदने की तदबीर इख्तियार फरमाई- इसका मतलब सुन्नते नबवी का तक़ाज़ा ये है कि इंसानी जान के तहफ्फुज़ के लिए सबसे बेहतरीन तदबीर इख्तियार की जाए और वक़्त की मुरव्वजा हिकमते अमलियों से फायदा उठाया जाए- मज़ीद ये कि वबा या ताऊन की हालत में समाजी मेलजोल ना रखना बल्कि घरों में मुक़ीद रहना.. लोगों का मुन्तशिर हो जाना और किसी भी ग्रुप में जमा होने से बचना बेहतरीन अमल है-
हज़रत अम्र बिन आस के फरमान से इस बात का भी इशारा मिलता है कि ऐसी हालत में मुसलमान इज्तिमाई शक्ल में ना रहें और यही तावील नमाज़े बा जमाअत या किसी भी इज्तिमा के लिए की जानी चाहिए..!!

About Author Mohamed Abu 'l-Gharaniq

when an unknown printer took a galley of type and scrambled it to make a type specimen book. It has survived not only five centuries.

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