अक़ायद
अक़ायद
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हर वो नया काम जो कुरुने सलासा में ना था बिदअत है पर क्या हर बिदअत गुमराही है आईये क़ुरान से पूछते हैं
और राहिब बनना तो ये बात उन्होंने दीन मे अपनी तरफ से निकाली हमने उनपर मुक़र्रर न की थी हां ये बिदअत उन्होंने अल्लाह तआला की रज़ा चाहने को पैदा की और फिर उसे ना निबाहा जैसा उसके निबाहने का हक़ था तो उनके ईमान वालों को हमने उसका सवाब अता किया
📕 पारा 27,सूरह हदीद,आयत 17
इस आयत कि तफसीर ये है कि हज़रत ईसा अलैहिस्सलाम की उम्मत के कुछ लोगों ने इबादते इलाही के लिए अपना घर छोड़ दिया,वो लोग मोटे कपडे पहनते,तुर्श ग़िज़ा खाते,बस्तियां छोड़कर जंगलों में रहते,शादी ब्याह ना करते हालांकि ऐसा उनको रब ने हुक्म नहीं दिया था मगर चुंकि वो ऐसा इबादत की गर्ज़ से करते थे सो उनकी इसी बिदअत को रब ने सराहा बल्कि सवाब भी अता किया,हदीसे पाक में है
हज़रत जरीर रज़ियल्लाहु तआला अन्हु से रिवायत है कि हुज़ूर सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फरमाया जो इस्लाम में किसी अच्छे तरीक़े को रायज करेगा तो उसको अपने रायज करने का भी सवाब मिलेगा और उन लोगों के अमल करने का भी जो उसके बाद इस तरीक़े पर अमल करते रहेंगे और अमल करने वालों के सवाब में कोई कमी ना होगी और जो इस्लाम में किसी बुरे तरीक़े को रायज करेगा तो उस शख्स को अपने रायज करने का भी गुनाह मिलेगा और उन लोगों के अमल करने का भी जो उसके बाद इस तरीक़े पर अमल करते रहेंगे और अमल करने वालों के गुनाह में कोई कमी ना होगी
📕 मुस्लिम,जिल्द 3,सफह 478
पर कुछ बेवक़ूफ जाहिलों ने सिर्फ शिर्क बिदअत का नाम सीख लिया और उसकी डिफनिशन सीखने से कासिर रह गए,बिदअत बिदअत चिल्लाने वाले देखें कि बिदअत की कितनी किस्में हैं
1. बिद'अते वाजिबा :- जैसे अल्लाह जल्ला शानहु और उसके हबीब सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के इल्म को समझने के लिए इल्मे नहु सीखना,उसूले फिक़ह और असमए रिजाल,क़ुरान के एराब वगैरह
2. बिद'अते मुस्तहबा :- जैसे मदरसे,मुसाफिर खाने और हर वो नेक काम जो ज़मानये रिसालत में ना थे
3. बिद'अते मकरुहा: - शाफियों के नज़दीक मस्जिद व क़ुरान मुक़द्दस का नक्शो निगार वग़ैरह,हनफियों के यहां बग़ैर कराहत जायज़ है
4. बिद'अते मुबाह - जैसे लज़ीज़ खाना,अच्छा कपड़ा,और तमाम जायज़ ऐशाइस के सामान
5. बिद'अते हराम :- हर वो नया काम जो सुन्नत के खिलाफ हो बिद'अते सय्यह है और इसी बिद'अत से कुल्लू बिदअतिन दलाला यानि हर बिद'अत गुमराही मुराद है
📕 शामी,जिल्द 1,सफह 393
📕 अशअतुल लमआत,जिल्द 1,सफह 128
और अगर हर बिद'अत यानि हर नया काम गुमराही होती तो पूरी दुनिया का निज़ाम दरहम बरहम हो जाता क्योंकि ये सब भी बिद'अत ही है,लिस्ट मुलाहज़ा करें
1. क़ुरान के 30 पारे,उनके नाम
2. क़ुरान में ज़ेर ज़बर,रुकु
3. 6 कलमे
4. इमाने मुफस्सल,मुजम्मल
5. फन्ने हदीस
6. फिक़ह
7. ज़बान से रोज़े नमाज़ की नियत
8. तरावीह की जमात
9. जुमे की दो अज़ाने
10. मस्जिदों की मेहराबें
11. मदरसे
12. हवाई जहाज़ से हज
13. सन हिजरी
14. और सबसे बड़ी बात ये कि आज की तमाम चीज़ें भी बिद'अत में शामिल है
📕 जाअल हक़,सफह 206
अब बिदअत की कुछ दलील इन मुनाफिकों यानि वहाबियों की किताबों से भी पढ़ लीजिए,मौलवी रशीद अहमद गंगोही लिखते हैं
तारीखे मुअय्यन पर खाना खिलाना बिदअत है मगर सवाब पहुंचेगा
📕 फतावा रशीदिया,जिल्द 1,सफह 88
बिदअत है मगर सवाब पहुंचेगा,अरे वाह जब बिदअत है तो तुम्हारे यहां तो हर बिदअत गुमराही है फिर गुमराही पर सवाब कैसे पहुंचेगा और जनाब वो भी सवाब किसे पहुंचा रहे हैं उन्हें जो मर कर मिटटी में मिल गए माज़ अल्लाह,मगर ये लिखने से पहले थोड़ा याद कर लेते कि आपने अपनी इसी फूहड़ किताब में ये लिख मारा है
वास्ते मय्यत के क़ुरान मजीद या कल्मा तय्यबह वफात के दूसरे या तीसरे रोज़ पढ़ना बिदअत व मकरूह है शरह में इसकी कोई अस्ल नहीं
📕 फतावा रशीदिया,जिल्द 1,सफह 101
अंधेर हो गई खाने का सवाब पहुंचेगा मगर क़ुरान का नहीं,क्या अजीब मन्तिक है,और देखिये
एक मर्तबा अशरफ अली थानवी ने रशीद अहमद गंगोही से पूछा कि क्या क़ब्र में शज़रह रखना जायज़ है और क्या सवाब पहुंचता है इस पर उन्होंने जवाब दिया हां जायज़ है और सवाब पहुंचता है
📕 तज़किरातुर्रशीद,जिल्द 2,सफह 290
बिदअत बिदअत चिल्लाने वालों ज़रा ये भी तो बताओ कि क्या कुरूने सलासा में भी शजरे छपते थे और क्या क़ब्र में भी रखे जाते थे,ये दो रूखे अक़ायद लिखने वाले तो कबके मर खप गए मगर आज भी उनके चेले इसी अक़ायद पर क़ायम हैं,अरे वहाबियों कुछ तो शर्म करो
खत्म-----
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हर वो नया काम जो कुरुने सलासा में ना था बिदअत है पर क्या हर बिदअत गुमराही है आईये क़ुरान से पूछते हैं
और राहिब बनना तो ये बात उन्होंने दीन मे अपनी तरफ से निकाली हमने उनपर मुक़र्रर न की थी हां ये बिदअत उन्होंने अल्लाह तआला की रज़ा चाहने को पैदा की और फिर उसे ना निबाहा जैसा उसके निबाहने का हक़ था तो उनके ईमान वालों को हमने उसका सवाब अता किया📕 पारा 27,सूरह हदीद,आयत 17
इस आयत कि तफसीर ये है कि हज़रत ईसा अलैहिस्सलाम की उम्मत के कुछ लोगों ने इबादते इलाही के लिए अपना घर छोड़ दिया,वो लोग मोटे कपडे पहनते,तुर्श ग़िज़ा खाते,बस्तियां छोड़कर जंगलों में रहते,शादी ब्याह ना करते हालांकि ऐसा उनको रब ने हुक्म नहीं दिया था मगर चुंकि वो ऐसा इबादत की गर्ज़ से करते थे सो उनकी इसी बिदअत को रब ने सराहा बल्कि सवाब भी अता किया,हदीसे पाक में है
हज़रत जरीर रज़ियल्लाहु तआला अन्हु से रिवायत है कि हुज़ूर सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फरमाया जो इस्लाम में किसी अच्छे तरीक़े को रायज करेगा तो उसको अपने रायज करने का भी सवाब मिलेगा और उन लोगों के अमल करने का भी जो उसके बाद इस तरीक़े पर अमल करते रहेंगे और अमल करने वालों के सवाब में कोई कमी ना होगी और जो इस्लाम में किसी बुरे तरीक़े को रायज करेगा तो उस शख्स को अपने रायज करने का भी गुनाह मिलेगा और उन लोगों के अमल करने का भी जो उसके बाद इस तरीक़े पर अमल करते रहेंगे और अमल करने वालों के गुनाह में कोई कमी ना होगी
📕 मुस्लिम,जिल्द 3,सफह 478
पर कुछ बेवक़ूफ जाहिलों ने सिर्फ शिर्क बिदअत का नाम सीख लिया और उसकी डिफनिशन सीखने से कासिर रह गए,बिदअत बिदअत चिल्लाने वाले देखें कि बिदअत की कितनी किस्में हैं
1. बिद'अते वाजिबा :- जैसे अल्लाह जल्ला शानहु और उसके हबीब सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के इल्म को समझने के लिए इल्मे नहु सीखना,उसूले फिक़ह और असमए रिजाल,क़ुरान के एराब वगैरह
2. बिद'अते मुस्तहबा :- जैसे मदरसे,मुसाफिर खाने और हर वो नेक काम जो ज़मानये रिसालत में ना थे
3. बिद'अते मकरुहा: - शाफियों के नज़दीक मस्जिद व क़ुरान मुक़द्दस का नक्शो निगार वग़ैरह,हनफियों के यहां बग़ैर कराहत जायज़ है
4. बिद'अते मुबाह - जैसे लज़ीज़ खाना,अच्छा कपड़ा,और तमाम जायज़ ऐशाइस के सामान
5. बिद'अते हराम :- हर वो नया काम जो सुन्नत के खिलाफ हो बिद'अते सय्यह है और इसी बिद'अत से कुल्लू बिदअतिन दलाला यानि हर बिद'अत गुमराही मुराद है
📕 शामी,जिल्द 1,सफह 393
📕 अशअतुल लमआत,जिल्द 1,सफह 128
और अगर हर बिद'अत यानि हर नया काम गुमराही होती तो पूरी दुनिया का निज़ाम दरहम बरहम हो जाता क्योंकि ये सब भी बिद'अत ही है,लिस्ट मुलाहज़ा करें
1. क़ुरान के 30 पारे,उनके नाम
2. क़ुरान में ज़ेर ज़बर,रुकु
3. 6 कलमे
4. इमाने मुफस्सल,मुजम्मल
5. फन्ने हदीस
6. फिक़ह
7. ज़बान से रोज़े नमाज़ की नियत
8. तरावीह की जमात
9. जुमे की दो अज़ाने
10. मस्जिदों की मेहराबें
11. मदरसे
12. हवाई जहाज़ से हज
13. सन हिजरी
14. और सबसे बड़ी बात ये कि आज की तमाम चीज़ें भी बिद'अत में शामिल है
📕 जाअल हक़,सफह 206
अब बिदअत की कुछ दलील इन मुनाफिकों यानि वहाबियों की किताबों से भी पढ़ लीजिए,मौलवी रशीद अहमद गंगोही लिखते हैं
तारीखे मुअय्यन पर खाना खिलाना बिदअत है मगर सवाब पहुंचेगा
📕 फतावा रशीदिया,जिल्द 1,सफह 88
बिदअत है मगर सवाब पहुंचेगा,अरे वाह जब बिदअत है तो तुम्हारे यहां तो हर बिदअत गुमराही है फिर गुमराही पर सवाब कैसे पहुंचेगा और जनाब वो भी सवाब किसे पहुंचा रहे हैं उन्हें जो मर कर मिटटी में मिल गए माज़ अल्लाह,मगर ये लिखने से पहले थोड़ा याद कर लेते कि आपने अपनी इसी फूहड़ किताब में ये लिख मारा है
वास्ते मय्यत के क़ुरान मजीद या कल्मा तय्यबह वफात के दूसरे या तीसरे रोज़ पढ़ना बिदअत व मकरूह है शरह में इसकी कोई अस्ल नहीं
📕 फतावा रशीदिया,जिल्द 1,सफह 101
अंधेर हो गई खाने का सवाब पहुंचेगा मगर क़ुरान का नहीं,क्या अजीब मन्तिक है,और देखिये
एक मर्तबा अशरफ अली थानवी ने रशीद अहमद गंगोही से पूछा कि क्या क़ब्र में शज़रह रखना जायज़ है और क्या सवाब पहुंचता है इस पर उन्होंने जवाब दिया हां जायज़ है और सवाब पहुंचता है
📕 तज़किरातुर्रशीद,जिल्द 2,सफह 290
बिदअत बिदअत चिल्लाने वालों ज़रा ये भी तो बताओ कि क्या कुरूने सलासा में भी शजरे छपते थे और क्या क़ब्र में भी रखे जाते थे,ये दो रूखे अक़ायद लिखने वाले तो कबके मर खप गए मगर आज भी उनके चेले इसी अक़ायद पर क़ायम हैं,अरे वहाबियों कुछ तो शर्म करो
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