❌ वहाबी फिरका
इस अब्दुल वहाब के बेटे ने एक किताब लिखी जिसका नाम ' किताबुत्तौहीद रखा । उसका तर्जमा हिन्दुस्तान में इसमाईल देहलवी ने किया जिसका नाम ' तकवीयतुल ईमान ' रखा।और हिन्दुस्तान में वहाबियत उसी ने फैलाई। उन वहाबियों का एक बहुत बड़ा अकीदा यह है जो उनके मज़हब पर न हो वह काफिर मुशरिक है। यही वजह है कि बात बात पर बिला वजह मुसलमानों पर कुफ्र और शिर्क का हुक्म लगाते और तमाम दुनिया को मुशरिक बताते हैं। चुनाँचे तक़वीयतुल ईमान पेज न 45 में वह हदीस लिखकर कि आख़िर ज़माने में अल्लाह तआला एक हवा भेजेगा जो सारी दुनिया से मुसलमानों को उठा लेगी उसके बाद साफ़ लिख दिया सो पैग़म्बरे खुदा के फ़रमाने के मुताबिक हुआ यानी वह हवा चल गई और कोई मुसलमान रूए ज़मीन पर न रहा। मगर यह न समझा कि इस सूरत में खुद भी काफ़िर हो गया ।
इस मज़हब की बुनियाद अल्लाह तआला और उसके महबूबों की तौहीन और तज़लील पर है। यह लोग हर चीज़ में वही पहलू इख्तियार करेंगे। जिससे शान घटती हो। इस मज़हब के सरगिरोहों के कुछ क़ौल नक़्ल किये जाते हैं। ताकि हमारे अवाम भाई उनके दिलों की ख़बासतों को जान कर उनके फ़रेब और धोके से बचते रहें और उनके जुब्बा और दस्तार पर न जायें । बरादराने इस्लाम ! गौर से सुनें और ईमान की तराज़ू में तौलें कि ईमान से अज़ीज़ मुसलमान के नज़दीक कोई चीज़ नहीं और ईमान अल्लाह और रसूल की ताज़ीम ही का नाम है। ईमान के साथ जिसमें जितने फ़ज़ाइल पाये जायें वह उसी कद्र ज्यादा फ़ज़ीलत रखता है और ईमान नहीं तो मुसलमानों के नज़दीक वह कुछ वकअत (हैसियत )नहीं रखता अगरचे कितना ही बड़ा आलिम, ज़ाहिद और तारिकुद्दुनिया बनता हो। मतलब यह है कि उनके मोलवी, आलिम फ़ाज़िल होने की वजह से तुम उन्हें अपना पेशवा न समझो जब कि वह अल्लाह और उसके रसूलों के दुश्मन हैं। यहूदियों, नसरानियों और हिन्दुओं में भी उनके मज़हब के आलिम और तारिकुद्दुनिया होते हैं तो क्या तुम उनको अपना पेशवा तसलीम कर सकते हो? हरगिज़ नहीं। इसी तरह यह ला मज़हब औ बदमज़हब तुम्हारे किसी तरहा पेशवा नहीं हो सकते।
*📗(हिंदी बहारे शरीअत पहला हिस्सा। पेज़ नं,57,58)*📗

No comments:
Post a Comment